हज़रत ख़्वाजा मुई’नुद्दीन चिश्ती की दरगाह- प्रोफ़ेसर निसार अहमद फ़ारूक़ी

 तारीख़ की बा’ज़ अदाऐं अ’क़्ल और मंतिक़ की गिरफ़्त में भी नहीं आतीं। रू-ए-ज़मीन पर ऐसे हादसात भी गुज़र गए हैं जिनसे आसमान तक काँप उठा है मगर तारीख़ के हाफ़िज़े ने उन्हें महफ़ूज़ करने की ज़रूरत नहीं समझी और एक ब-ज़ाहिर बहुत मा’मूली इन्फ़िरादी अ’मल-ए-जावेदाँ बन गया है और उसके असरात सदियों पर फैल… continue reading

शैख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार और शैख़ सनआँ की कहानी

शैख़ फ़रीदुद्दीन अ’त्तार ने अपनी सूफ़ियाना शाइरी से फ़ारसी सूफ़ी साहित्य को विश्व भर में स्थापित कर दिया। शैख़ फ़रीदुददीन अ’त्तार के समक्ष मौलाना रूमी अपने आप को तुच्छ समझते थे – हफ़्त शहरे इश्क़ रा अत्तार गश्त मा हनुज़ अन्दर ख़म-ए-यक कूच:ऐम (अर्थात – अ’त्तार ने इश्क़-ए-हक़ीक़ी के सातों शहरों का भ्रमण कर लिया… continue reading

हज़रत औघट शाह वारसी और उनका कलाम

हिन्दुस्तान की सूफ़ी भक्ति परम्परा कई मायनों में इसे ख़ास बनाती है.सूफ़ियों और भक्ति कवियों ने अपने अपने क्षेत्र के प्रचलित प्रतीकों का अपने काव्य में प्रयोग किया और प्रेम और सद्भावना के सन्देश को आ’म किया. यही कारण है कि हिन्दुस्तान में तसव्वुफ़ और भक्ति आन्दोलन के विविध रूप मिल जाते हैं और हर… continue reading

हज़रत बेदम शाह वारसी और उनका कलाम

सूफ़ी संतों के कलाम भाव प्रधान होते हैं इसलिए जीवन पर अपनी गहरी छाप छोड़ जाते हैं. एक दिन दरगाह निज़ामुद्दीन औलिया में बैठा मैं क़व्वाली सुन रहा था. अक्सर देश भर से क़व्वाल हाज़िरी लगाने हज़रत की दरगाह पर आते हैं और कुछ कलाम पढ़ कर, महबूब-ए-इलाही के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं…. continue reading

अल-ग़ज़ाली की ‘कीमिया ए सआदत’ की तीसरी क़िस्त

द्वितीय उल्लास (भगवान् की पहचान) पहली किरण शरीर और संसार की वस्तुओं पर विचार करने से भगवान् की पहचान      सन्तों का यह वचन प्रसिद्ध है और उन्होंने यही उपदेश दिया है कि जब तुम अपने-आपको पहचानोगे तभी निःसन्देह भगवान् को भी पहचान सकोगे। प्रभु भी कहते हैं कि जिसने अपने आत्मा और मन को… continue reading

शैख़ हुसामुद्दीन मानिकपूरी

इक्सीर-ए-इ’श्क़ अ’ल्ला-म-तुलवरा हज़रत मख़्दूम शैख़ हुसामुद्दीन मानिकपूरी रहमतुल्लाहि अ’लैहि का शुमार बर्रे-ए-सग़ीर के मशाइख़-ए-चिशत के अकाबिर सूफ़िया  में होता है। आप हज़रत शैख़ नूर क़ुतुब-ए-आ’लम पंडवी बिन शैख़ अ’लाउ’ल-हक़ पंडवी रहमतुल्लाहि-अलैह के मुरीद-ओ-ख़लीफ़ा हैं। आपका तअ’ल्लुक़ सूबा-ए-उत्तरप्रदेश के एक तारीख़ी क़स्बे गढ़ी मानिकपूर, ज़िला प्रतापगढ़ से है। जिसका क़दीमी नाम कड़ा मानिकपूर है। आपकी विलादत… continue reading