हज़रत शाह ‘अकबर’ दानापुरी और “हुनर-नामा”

फिरेंगे कैसे दिन हिंदुस्ताँ के

बला के ज़ुल्म हैं इस आसमाँ के

अगर हिंदू-मुसलमाँ मेल कर लें

अभी घर अपने ये दौलत से भर लें

गया इक़्बाल फिर आए हमारा

अभी इदबार गिर जाए हमारा

इलाही एक दिल हो जाएं दोनों

वज़ारत इंडिया की पाएं दोनों

अमीर ख़ुसरो बुज़ुर्ग और दरवेश की हैसियत से-मौलाना अ’ब्दुल माजिद दरियाबादी

ख़ालिक़-बारी का नाम भी आज के लड़कों ने न सुना होगा। कल के बूढ़ों के दिल से कोई पूछे किताब की किताब अज़-बर थी।ज़्यादा नहीं पुश्त दो पुश्त उधर की बात है कि किताब थी मकतबों में चली हुई, घरों में फैली हुई, ज़बानों पर चढ़ी हुई| गोया अपने ज़माना-ए-तस्नीफ़ से सदियों तक मक़्बूल-ओ-ज़िंदा, मश्हूर-ओ-ताबिंदा।… continue reading

हज़रत बख़्तियार काकी रहमतुल्लाहि अ’लैह-मोहम्मद अल-वाहिदी

ज़िंदः-ए-जावेदाँ ज़े-फ़ैज़-ए-अ’मीमकुश्तः-ए-ज़ख़्म-ए-ख़ंजर-ए-तस्लीम आपका पूरा नाम ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी है। सरज़मीन-ए-अद्श में (जो मावराऊन्नहर के इ’लाक़ा में वाक़े’ है) पैदा हुए थे। आपकी निस्बत बहुत से ऐसे वाक़िआ’त बयान किए जाते हैं जिनसे मा’लूम होता है कि आपकी विलायत का सिक्का आपकी विलादत-ए-बा-सआ’दत से पहले ही बैठना शुरूअ’ हो गया था। लेकिन अफ़्सोस है अ’जीब-ओ-ग़रीब… continue reading

मंसूर हल्लाज

हज़रत हुसैन बिन मंसूर हल्लाज की शहादत का क़िस्सा लिखने से पहले ये बता देना ज़रूरी है कि आपका फ़साना इस क़दर पेचीदा और पुर-असरार है कि इस मुख़्तसर बयान में समाता मा’लूम नहीं होता। शोर-ए-मंसूर अज़ कुजा-ओ-दार-ए-मंसूर अज़ कुजा। ख़ुद ज़दी बांग-ए-अनल-हक़  बर सर-ए-दार आमदी।। ये कुछ ईरान-ओ-अ’रबिस्तान ही में नहीं बल्कि अक्सर मुल्कों… continue reading

बाबा फ़रीद शकर गंज

(पाल माल गज़ट लंदन से तर्जुमा ) पाक पट्टन शरीफ़ दुनिया-ए-तवारीख़ को अजोधन के नाम से तेईस सौ साल से मा’लूम है लेकिन उसका दूसरा नाम पाक पट्टन शरीफ़ आज से आठ सौ साल क़ब्ल उसे मिला था। उस वक़्त से ये अपने क़िला’ की मज़बूती के लिए नहीं बल्कि एक मुक़द्दस हस्ती की जा-ए-आराम… continue reading

ख़्वाजा उ’स्मान हारूनी: सीरत, करामात,अक़्वाल-ओ-ता’लीमात

 (विलादत 526 या 510 हिज्री1129 ई’स्वी, विसाल 6 शव्वालुल-मुकर्रम 617 हिज्री 1220, 3 नवंबर)‘आँ इमाम-ए-अस्हाब-ए-विलाएत,आँ सुल्तान-ए-क़ाफ़िला-ए- हिदायत,आँ दाइम ब-मक़ाम-ए-मुशाहिदः-ए-बातिनी’(1) (बह्र-ए-ज़ख़ाइर, सफ़्हा 433) अल्लाह यूँ  तो हर दौर में वली पैदा फ़रमाता है जो दुनिया-ए-मा’रिफ़त का निज़ाम चलाते हैं लेकिन उसमें उ’रूज-ओ-ज़वाल कमी-ओ-बेशी आती रहती है। जो मरातिब तक़सीम होते हैं उनमें ज़माने के हलात-ओ-ज़रूरियात का… continue reading