Articles By Sufinama

Sufism transcends religion, language, nationality and has, over the years, emerged as a unifying force that moves us beyond the physical realm, into a spiritual one. Sufinama is dedicated to the legend of #Sufis and #Saints of Indian Subcontinent and all over the world. #Sufinama. #Sufism

Mulla Nasiruddin Modern tales-12

‘Blessing is excess, so to speak, an excess of everything. Don’t be content with being a faqih (religious scholar), say I want more – more than being a Sufi (a mystic), more than being a mystic – more than each thing that comes before you. Nasruddin loved this quote by his fellow guest from the… continue reading

काउंट ग्लारज़ा का ख़त हज़रत वारिस पाक के नाम

सबा वारसी कहते हैं- दिलबर हो दिलरुबा हो आलम-पनाह वारिससुल्तान-ए-औलिया हो आलम-पनाह वारिस किस की मजाल है जो कशती मेरी डुबो देजब आप नाख़ुदा हो आलम-पनाह वारिस ये जान-ओ-दिल जिगर सब उस को निसार कर दूँजो तेरा बन गया हो आलम-पनाह वारिस हसरत यही है मेरी कि तो मेरे सामने होबाब-ए-करम खुला हो आलम-पनाह वारिस… continue reading

हज़रत सय्यद अशरफ़ जहाँगीर सिमनानी रहमतुल्लाह अ’लैह

लताएफ़-ए-अशरफ़ी में हैं कि हज़रत सय्यद अशरफ़ के आने से पहले हज़रत अ’लाउद्दीन ने अपने मुरीदों को बशारत दी थी कि

आँ कसे कि अज़ दो साल इंतिज़ार-ए-ऊ मी-कशीदः-ऐम-ओ-तरीक़-ए-मुवासलत-ए-ऊ मी-दीद:-ऐम इमरोज़ फ़र्दा मी-रसद (जिल्द 2 सफ़हा 95)

और जब हज़रत सय्यद अशरफ़ पंडोह के क़रीब पहुँचे तो हज़रत अ’लाउद्दीन क़ैलूला फ़रमा रहे थे लेकिन यकायक बोले

“बू-ए-यार मी आयद” ।

हज़रत शाह बर्कतुल्लाह ‘पेमी’ और उनका पेम प्रकाश

‘पेमी’ हिन्दू तुरक में, हर रंग रहो समाय
देवल और मसीत में, दीप एक ही भाय.

सन्यासी फ़क़ीर आंदोलन – भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम

बात उस समय की है जब अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान पर अपना अधिकार जमाने के पश्चात इसे लूटना प्रारंभ कर दिया था । हिन्दुस्तान की जनता उनके तरह तरह के हथकंडों से परेशान हो चुकी थी. । अंग्रेजों ने अपने साथ यहाँ के जमींदारों और साहूकारों को भी मिला  लिया था और इनकी सांठ-गाँठ से देश… continue reading

जिन नैनन में पी बसे दूजा कौन समाय

यह प्रेम की डोर ही जीवन है. इस से बंध कर ही आत्मा की पतंग उड़ती है. कभी कभी ऐसा भ्रम होता है कि यह डोर न होती तो शायद पतंग और ऊँचे जाती परन्तु जैसे ही यह डोर टूटती है पतंग सीधी ज़मीन पर आ गिरती है.

आज रंग है !

रंगों से हिंदुस्तान का पुराना रिश्ता रहा है. मुख़्तलिफ़ रंग हिंदुस्तानी संस्कृति की चाशनी में घुलकर जब आपसी सद्भाव की आंच पर पकते हैं तब जाकर पक्के होते हैं और इनमें जान आती है. यह रंग फिर ख़ुद रंगरेज़ बन जाते हैं और सबके दिलों को रंगने निकल पड़ते हैं. होली इन्हीं ज़िंदा रंगों का त्यौहार है.

सूफ़ी क़व्वाली में महिलाओं का योगदान

सूफ़ी क़व्वाली में महिलाओं का योगदान

हज़रत मुन्इ’म-ए-पाक अबुल-उ’लाई-शाह हुसैन अब्दाली इस्लामपुरी

आपने अपनी सारी ज़िंदगी फ़क़्र-ओ-फ़ाक़ा में बसर की।और रहने के लिए मकान नहीं बनाया और न मुतअह्हिल हुए। आप उमरा से मिलते थे और न नज़्र क़ुबूल करते थे और न अपने पास रुपया पैसा ही रखते थे।

प्यारे भाई क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी -ख्व़ाजा साहब के ख़ुतूत अपने मुरीद-ए-ख़ास के नाम

इसलिए अगर तसव्वुफ़ की असलियत से वाक़िफ़ होना चाहते हो तो अपने पर आराम का दरवाज़ा बंद कर दो और फिर मोहब्बत के बल बैठ जाओ ! अगर तुम ने यह कर लिया तो समझो कि बस तसव्वुफ़ के आ’लिम हो गए।