Articles By Sufinama Archive

Sufinama Archive is an initiative to reproduce old and rare published articles from different magazines specially on Bhakti movement and Sufism.

Amir Khusraw and his Adaptability – J. Dadademery

It is rare that a man excels in more than one facet of life.   Yet when he does, he leaves an indelible mark in the history of his country and often in the annals of the world. It is about one such towering personality that in my humble way I wish to speak today to… continue reading

सतगुरू नानक साहिब

बाबा प्यारे! हमको ये बता कि आ’लिम और जाहिल में क्या फ़र्क़ है? इर्शाद हुआ:
“आ’लिम एक तालाब की मानिंद है।जाहिल और मुतअ’स्सिब लोग जो इर्फ़ान-ए-इलाही से बे-नसीब हैं मेंढ़क की तरह कीचड़ में फंसे हुए हैं।और आ’रिफ़ान-ए-अहदियत उस तालाब में कंवल के फूल हैं और तालिबान-ए-हक़ भँवरे हैं।
“मेंढ़क कंवल के पास ही रहता है लेकिन हक़ीक़त में हज़ारों कोस दूर है क्यूँकि कंवल की ख़ुशबू से बे-बहरा है।और भौंरा जंगल में रहता है मगर चूँकि वो ख़ुश्बू की लज़्ज़त और कंवल रस का शाएक़ होता है,दूर से आ कर लुत्फ़-ए-सोहबत उठाता है और तसल्ली-ए-राहत पाता है।”

हज़रत बाबा फ़रीद के ख़ुलफ़ा-प्रोफ़ेसर ख़लीक़ अहमद निज़ामी फ़रीदी

सियरुल-अक़्ताब के मुसन्निफ़ ने हज़रत बाबा फ़रीद के ख़ुलफ़ा की तादाद कसीर बताई है।मगर अमीर-ए-ख़ुर्द ने सिर्फ़ मुंदर्जा ज़ैल ख़ुल़फ़ा का हवाला दिया है। 1۔ शैख़ नजीबुद्दीन मुतवक्किल रहमतुल्लाहि अ’लैह 2۔ मौलाना बदरुद्दीन इस्हाक़ 3۔ शैख़ निज़ामुद्दीन औलिया 4۔ शैख़ अ’ली साबिर 5۔ शैख़ जमालुद्दीन हांसवी 7۔ शैख़ आ’रिफ़ 8۔ मौलाना फ़ख़्रुद्दीन सफ़ाहानी मुतअख़्ख़िरीन ने… continue reading

कलाम-ए-‘हाफ़िज़’ और फ़ाल-मौलाना मोहम्मद मियाँ साहिब क़मर देहलवी,मस्जिद फ़त्हपुरी देहली

एक बहुत बड़ा तबक़ा है जो अपनी मुहिम्मात और पेश आने वाले वाक़िआ’त में ‘हाफ़िज़’ के कलाम से फ़ाल निकाल कर अपने क़ल्ब को मुत्मइन करता रहा है और हाफ़िज़ की सदा को एक ग़ैबी आवाज़ यक़ीन कर के अपने कामों की उसको बुनियाद बनाता रहा है और हाफ़िज़-ओ-कलाम-ए-हाफ़िज़ को लिसानुल-ग़ैब का दर्जा देता रहा है।

हज़रत अ’लाउद्द्दीन अहमद साबिर कलियरी

बाबा साहिब फ़रमाया करते थे :

“इ’ल्म-ए-सीना-ए-मन दर ज़ात-ए-शैख़ निज़ामुद्दीन बदायूनी, इ’ल्म-ए-दिल मन शैख़ अ’लाउ’द्दीन अ’ली अहमद सरायत कर्दः”

(मेरे सीने के इ’ल्म ने शैख़ निज़ामुद्दीन बदायूनी की ज़ात में और मेरे दिल के इ’ल्म ने शैख़ अ’लाउ’द्दीन अ’ली अहमद साबिर की ज़ात में सरायत की है।

सूफ़िया-ए-किराम और ख़िदमात-ए-उर्दू-अज़ सय्यद मुहीउद्दीन नदवी

सूबा बिहार जो आज से सदियों नहीं हज़ारों साल पहले हिंदू-मज़हब, बोद्ध-धर्म, जैनी-मत और वैदिक धर्म का मंबा रह चुका है क्यूँकर मुमकिन था कि वो उन मुबारक हस्तियों के फ़ूयूज़-ओ-बरकात की बारिश से महरूम रहता। चुनाँचे मलिक इख़्तियारुद्दीन मोहम्मद बख़्तियार खिल्जी के आने से पहले ही सूफ़िया-ए-किराम का एक मुक़द्दस ताइफ़ा यहाँ नुज़ूल-ए-अजलाल फ़रमा चुका था और अपनी नूरानी शुआओं’ से सर-ज़मीन-ए-बिहार के हर-हर ज़र्रा को मेहर-ओ-माह बना कर चमका रहा था।उनमें अक्सर-ओ-बेशतर बुज़ुर्ग थे जिन्हों ने अपने ख़यालात-ओ-तब्लीग़ी सर-गर्मियों के इज़हार का ज़रिआ’ उर्दू ज़बान ही को बनाया। आज की नशिस्त में हम बिहार के एक बा-ख़ुदा सूफ़ी के कलाम का मुख़्तसर-सा नमूना पेश करते हैं जिससे ब-ख़ूबी अंदाज़ा किया जा सकता है कि उर्दू ज़बान की तौसीअ’-ओ-ता’रीज में सूफ़िया-ए-उ’ज़्ज़ाम का किस दर्जा हिस्सा है।

हज़रत सूफ़ी मनेरी की तारीख़-गोई का एक शाहकार – जनाब रख़्शाँ अब्दाली, इस्लामपुरी

हज़रत सूफ़ी मनेरी (सन 1253 हिज्री ता सन 1318 हिज्री )अपने वक़्त के एक बा-कमाल शाइ’र थे। आपको हज़रत-ए-ग़ालिब से तलम्मुज़ था।आपके समंद-ए-फ़िक्र की जौलान-गाह उर्दू ही की वादी नहीं बल्कि ज़मीन-ए-पारस भी थी और नस्र-ओ-नज़्म दोनों ही हैं।

बर्र-ए-सग़ीर में अ’वारिफ़ुल-मआ’रिफ़ के रिवाज पर चंद शवाहिद-(आठवीं सदी हिज्री तक)-डॉक्टर आ’रिफ़ नौशाही

शैख़ गंज शकर 569-664 हिज्री) अ’वारिफ़ का दर्स देते थे। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने अ’वारिफ़ के पाँच अबवाब उन्हीं से पढ़े थे। गंज शकर का पढ़ाने का अंदाज़ बहुत दिल-नशीन था और कोई दूसरा उन जैसा अ’वारिफ़ नहीं पढ़ा सकता था। बारहा ऐसा हुआ कि सुनने वाला उनके ज़ौक़-ए-बयान में ऐसा मह्व हुआ कि ये तमन्ना करते पाया गया कि काश उसी लम्हे मौत आ जाए तो बेहतर है। एक दिन ये किताब शैख़ की ख़िदमत में लाई गई तो इत्तिफ़ाक़ से उसी दिन उनके हाँ लड़का पैदा हुआ। शैख़ुश्शुयूख़ के लक़ब की मुनासबत से उस का लक़ब “शहाबुद्दीन” रखा गया।

हज़रत ख़्वाजा गेसू दराज़ चिश्ती अक़दार-ए-हयात के तर्जुमान-डॉक्टर सय्यद नक़ी हुसैन जा’फ़री

जवामिउ’ल-कलिम में मज़कूर है कि एक-बार मौलाना ज़ैनुद्दन दौलताबादी, ख़लीफ़ा मौलाना बुर्हानुद्दीन ग़रीब ने बंदगी-ए-ख़्वाजा से अ’र्ज़ किया कि इस ग़रीब के मरज़-ए-दिल की सेहत के लिए दुआ’ फ़रमाएं तो बंदगी-ए-ख़्वाजा ने अपने दाँतों से उंगली पकड़ ली और फ़रमाया कि मौलाना दिल को मरीज़ न कहिए।