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हज़रत शैख़ अ’लाउ’द्दीन क़ुरैशी-ग्वालियर में नवीं सदी हिज्री के शैख़-ए-तरीक़त और सिल्सिला-ए-चिश्तिया के बानी

हिन्दुस्तान की तारीख़ भी कितनी अ’ज़ीब तारीख़ है। यहाँ कैसी कैसी अ’दीमुन्नज़ीर शख़्सियतें पैदा हुईं। इ’ल्म-ओ-इर्फ़ान के कैसे कैसे सोते फूटे।
हिंदुस्तान से अ’रब का तअ’ल्लुक़ एक क़दीम तअ’ल्लुक़ है। मशाएख़ीन-ए-तरीक़त ने अपनी बे-दाग़ ज़िंदगी यहाँ अ’वाम के सामने रखी। यहाँ की बोलियों में उनसे कलाम किया।

अमीर ख़ुसरो की सूफ़ियाना शाइ’री-डॉक्टर सफ़्दर अ’ली बेग

सूफ़ियों के अ’क़ीदे में ख़ुदा की ज़ात ही सबसे अहम-तरीन है। जिसके तसव्वुर में इन्सान मुस्तग़रक़ हो जाए उनका कहना है कि ये इन्सानी अ’क़्ल के बस से बाहर है कि वो ख़ुदा को समझ सके और उसकी ता’रीफ़-ओ-तमजीद कर सके।दिमाग़-ए-इन्सानी ज़मान-ओ-मकान में महदूद है इसलिए जो शय ज़मान-ओ-मकान के हुदूद से मावरा हो, उस… continue reading

Learn from the Hindu how worship is done: Amir Khusro

There are as many paths as there are grains of sand. -Nizamuddin Auliya Oh you who sneer at the idolatry of the Hindu, Learn also from him how worship is done. –Amir Khusro Six yogis once came to Nizamuddin’s hospice in Ghiyaspur and started to meditate in front of his door. They did not utter… continue reading

अमीर ख़ुसरो और इन्सान-दोस्ती-डॉक्टर ज़हीर अहमद सिद्दीक़ी

आज जिस मौज़ूअ’ पर दा’वत-ए-फ़िक्र दी गई है वो “अमीर ख़ुसरो और इन्सान-दोस्ती का मौज़ूअ’ है । देखना ये है कि हज़रत अमीर ख़ुसरो ने ज़िंदगी की इस रंगा-रंगी को किस नज़र से देखा है और इसको किस तरह बरता है । इन्सान-दोस्ती का वो कौन सा नसबुल-ऐ’न है जो अमीर ख़ुसरो के सिल्सिला से… continue reading

अमीर ख़ुसरो बुज़ुर्ग और दरवेश की हैसियत से-मौलाना अ’ब्दुल माजिद दरियाबादी

ख़ालिक़-बारी का नाम भी आज के लड़कों ने न सुना होगा। कल के बूढ़ों के दिल से कोई पूछे किताब की किताब अज़-बर थी।ज़्यादा नहीं पुश्त दो पुश्त उधर की बात है कि किताब थी मकतबों में चली हुई, घरों में फैली हुई, ज़बानों पर चढ़ी हुई| गोया अपने ज़माना-ए-तस्नीफ़ से सदियों तक मक़्बूल-ओ-ज़िंदा, मश्हूर-ओ-ताबिंदा।… continue reading

हज़रत बख़्तियार काकी रहमतुल्लाहि अ’लैह-मोहम्मद अल-वाहिदी

ज़िंदः-ए-जावेदाँ ज़े-फ़ैज़-ए-अ’मीमकुश्तः-ए-ज़ख़्म-ए-ख़ंजर-ए-तस्लीम आपका पूरा नाम ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी है। सरज़मीन-ए-अद्श में (जो मावराऊन्नहर के इ’लाक़ा में वाक़े’ है) पैदा हुए थे। आपकी निस्बत बहुत से ऐसे वाक़िआ’त बयान किए जाते हैं जिनसे मा’लूम होता है कि आपकी विलायत का सिक्का आपकी विलादत-ए-बा-सआ’दत से पहले ही बैठना शुरूअ’ हो गया था। लेकिन अफ़्सोस है अ’जीब-ओ-ग़रीब… continue reading