Articles By Muhammad Raiyan Abulolai

हज़रत शाह ‘अकबर’ दानापुरी और “हुनर-नामा”

फिरेंगे कैसे दिन हिंदुस्ताँ के

बला के ज़ुल्म हैं इस आसमाँ के

अगर हिंदू-मुसलमाँ मेल कर लें

अभी घर अपने ये दौलत से भर लें

गया इक़्बाल फिर आए हमारा

अभी इदबार गिर जाए हमारा

इलाही एक दिल हो जाएं दोनों

वज़ारत इंडिया की पाएं दोनों

है शहर ए बनारस की फ़ज़ा कितनी मुकर्रम

महसूस यूँ हुआ कि हम जन्नत में आ गए
कैसी है देखो आज फ़ज़ा कुछ न पूछिए

हज़रत मौलाना शाह हिलाल अहमद क़ादरी मुजीबी

शाह हिलाल अहमद साहिब की ज़ात ने ख़ानक़ाही अंदाज़ ओ अतवार को शोहरत दी। ख़ानक़ाही माहौल के साथ मदरसा ओ इफ़्ता के वक़ार में कभी कमी महसूस नहीं होने दिया। हर छोटे बड़े सब से मिला करते थे और अपने उम्दा अख़्लाक़ की वज्ह से बहुत जल्द उनके क़रीब हो जाया करते। अपने इल्म ओ अमल, तक़्वा ओ परहेज़ गारी,आजिज़ी ओ इन्किसारी में अपने अस्लाफ़ के पैरो कार थे। उनकी रिवायतों के अमीन थे। उनकी निगाह अपने अस्लाफ़ को देखा करती थी। उन्होंने कई बुज़ुर्गों का दौर देखा था और उनकी सोहबत भी उठाई थी।

हकीम सय्यद शाह अलीमुद्दीन बल्ख़ी फ़िरदौसी

शाह अलीमुद्दीन बल्ख़ी साहिब ने 1946 ईस्वी का फ़साद भी देखा था। जब मुल्क में क़त्ल ओ ग़ारत का सिलसिला ज़ोरों पर था लोग देही इलाक़ों से शहरों की जानिब कूच कर रहे थे तो उनमें शाह साहिब भी अपने वालिद के साथ फ़तूहा से शहर ए अज़ीमाबाद आने वालों में शरीक थे। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मौलाना अब्दुल-क़ादिर अज़ाद सुबहानी, सर सय्यद अली इमाम बैरिस्टर वग़ैरा की सोहबत ओ संगत भी शाह साहिब को बहुत कुछ ज़िंदगी के अमली मैदान में सिखा गई।

ज़िक्र ए ख़ैर हज़रत शाह अहमद हुसैन चिश्ती शैख़पूरवी

छोटा शैख़पुरा चिश्तियों की क़दीम आमाज गाह है मगर यहाँ क़ादरी,सुहरवर्दी और अबुल उलाई बुज़ुर्ग भी आराम फ़रमा हैं। तज़्किरे और तारीख़ के हवाले से ये जगह हज़रत ताज महमूद हक़्क़ानी (तारीख़ ए विसाल 14 जमादी अल आख़िर)से इबारत है। नवीं सदी हिज्री में हज़रत ख़्वाजा सय्यद अब्दुल्लाह चिश्ती (पंजाब, पाकिस्तान) से रुश्द ओ हिदायत  के लिए छोटा… continue reading

ज़िक्र-ए-ख़ैर ख़्वाजा अमजद हुसैन नक़्शबंदी माह अज़ीमाबादी

हिन्दुस्तान में ख़ानक़ाहें और बारगाहें कसरत से वजूद में आईं जहाँ शब ओ रोज़ बंदगान ए ख़ुदा को तालीम ओ तल्क़ीन दी जाती रही। उन मुतबर्रक ख़ानक़ाहों में बाज़ ऐसी भी ख़ानक़ाहें हुईं जो बिल्कुल मतानत ओ संजीदगी और सादगी ओ सख़ावत का मुजस्समा साबित हुईं जहाँ रूहानियत और मारिफ़त का ख़ास ख़याल रखा जाता… continue reading

ज़िक्र-ए-ख़ैर हज़रत सय्यद शाह अ’ज़ीज़ुद्दीन हुसैन मुनइ’मी

सूबा-ए-बिहार का दारुस्सुल्तनत अ’ज़ीमाबाद न सिर्फ़ मआ’शी-ओ-सियासी और क़दीमी लिहाज़ से मुम्ताज़ रहा है बल्कि अपने इ’ल्म-ओ-अ’मल, अख़्लाक़-ओ-इख़्लास, अक़्वाल-ओ-अफ़्आ’ल, गुफ़्तार-ओ-बयान और मा’रिफ़त-ओ-हिदायात से कई सदियों को रौशन किया है। यहाँ औलिया-ओ-अस्फ़िया की कसरत है। बंदगान-ए-ख़ुदा की वहदत है। चारों जानिब सूफ़ियों की शोहरत है।वहीं अहल-ए-दुनिया के लिए ये जगह निशान-ए-हिदायत है। चौदहवीं सदी हिज्री में बिहार के मशाइख़ का अ’ज़ीम कारनामा ज़ाहिर… continue reading

ज़िक्र-ए-ख़ैर हज़रत शाह ग़फ़ूरुर्रहमान ‘हम्द’ काकवी

कमालाबाद उ’र्फ़ काको की क़दामत के तो सब क़ाएल हैं।आज से 700 बरस क़ब्ल मुस्लिम आबादी का आग़ाज़ हुआ। इस तरह तवील अ’र्सा में ना जाने कितने मशाएख़ और दानिश-मंद गुज़रे जिनके मज़ारात आज भी काको के मुख़्तलिफ़ मक़ामात पर शिकस्ता-हाल में मौजूद हैं। काको में चंद ऐसे ख़ानदान भी मौजूद हैं जो तक़रीबन 250 बरस से आबाद हैं।उन्हीं… continue reading

ज़िक्र ए खैर हज़रत शाह अय्यूब अब्दाली इस्लामपुरी

बिहार की सर-ज़मीन हमेशा से मर्दुम-ख़ेज़ रही है। न जाने कितने इल्म ओ अदब और फ़क़्र ओ तसव्वुफ़ की शख़्सियत ने जन्म लिया है। उन्हीं में एक नाम हज़रत सय्यद अलीमुद्दीन दानिश-मंद गेसू दराज़ का है । वो  शहर ए नेशापुर (ईरान) से मुंतक़िल हो कर हिन्दुस्तान में बिहार शरीफ़ (नालंदा) में हज़रत मख़दूम ए… continue reading

ज़िक्र ए ख़ैर हज़रत हसन जान अबुल उलाई शहसरामी

हमारे सूबा ए बिहार में शहसराम को ख़ास दर्जा हासिल है।यहाँ औलिया ओ अस्फ़िया और शाहान ए ज़माना की कसरत है। इस बात से किसी को इंकार नहीं कि शहसराम की बुलंदी शेर ख़ाँ सूरी (1545) से है। देखने वालों ने देखा है कि बड़े नव्वाबीन और शाहान ए ज़माना हुक्मरानी कर के ख़ाक नशीन… continue reading