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हज़रत पीर नसीरुद्दीन “नसीर”

“बात इतनी है और कुछ भी नहीं” हज़रत पीर नसीरुद्दीन ‘नसीर’ मशहूर शाइर, अदीब, रिसर्चदाँ, ख़तीब, आलिम और गोलड़ा शरीफ़ की दरगाह के सज्जादा-नशीन थे। वो उर्दू, फ़ारसी, पंजाबी के साथ-साथ अरबी, हिन्दी, पूरबी और सरायकी ज़बानों में भी शाइरी करते थे, इसीलिए उन्हें “सात ज़बानों वाला शाइर” के नाम से भी याद किया जाता… continue reading

हज़रत शाह तुराब अ’ली क़लन्दर और उनका काव्य

सूफ़ी-संतों के योगदान को अगर एक वाक्य में लिखना हो तो हम कह सकते हैं कि सूफ़ी और भक्ति संतों ने हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब को नाम दिए हैं। ये नाम गंगा-जमुनी तहज़ीब को जोड़ कर रखने वाली कड़ियाँ हैं। सूफ़ी-संतों ने हिंदुस्तान में गंगा-जमुनी तहज़ीब की आधार-शिला रखी और धीरे-धीरे हिंदुस्तान में साझा संस्कृति… continue reading

ख़्वाजा मीर दर्द और उनका जीवन

दिल्ली शहर को बाईस ख्व़ाजा की चौखट भी कहा जाता है। इस शहर ने हिन्दुस्तानी तसव्वुफ़ को एक नई दिशा दी। इस ने जहाँ क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी, ख्व़ाजा निज़ामुद्दीन औलिया, नसीरुद्दीन चिराग़-ए-दिल्ली और हज़रत अमीर ख़ुसरौ का ज़माना देखा है, वहीं यह शहर विभिन्न मतों का भी साक्षी रहा है। इस शहर ने वहदत-उल-वजूद से… continue reading

Suf, Tasawwuf aur Mausiqi: Episode-1 (Fariduddin Ayaz)

We travelled by an auto rickshaw in the streets of Old Delhi, people from air conditioned SUVs rolled down their window to wish him with the humblest of salaams, he responded to them with his folded hands. Some strangers from the pavement recognized him at Connaught place and requested him to pray for them. He… continue reading

हज़रत शैख़ नजीबुद्दीन मुतवक्किल

हज़रत शैख़ नजीबुद्दीन मुतवक्किल साहिब-ए-दिल थे, आप साहब-ए-कश्फ़-ओ- करामात,सनद-ए-औलिया और हुज्जत-ए-मशाएख़-ए-वक़्त,मुशाहिदात-ओ- मक़ालात-ए-‘आली में यकता,तमाम मशाएख़-ए-वक़्त के कमालात-ए-सुवरी-ओ- मा’नवी के मक़र्र थे। आप हज़रत बाबा फ़रीदुद्दीन मसऊ’द गंज शकर के हक़ीक़ी भाई, मुरीद और ख़लीफ़ा थे। ख़ानदानी हालात: आप फ़र्रूख़ शाह के ख़ानदान से थे, फ़र्रूख़ शाह काबुल के बादशाह थे, जब गज़नी ख़ानदान का ऊ’रुज… continue reading

बहादुर शाह और फूल वालों की सैर-जनाब मिर्ज़ा फ़रहतुल्लाह बेग देहलवी

सा’दी ’अलैहर्रहमा ने ख़ूब कहा है र’ईयत-ए-चू बीख़स्त-ओ-सुल्ताँ दरख़्त दरख़्त ऐ पिसर बाशद अज़ बीख़ सख़्त ये जड़ों ही की मज़्बूती थी कि दिल्ली का सर-सब्ज़-ओ-शादाब चमन अगरचे हवादिस-ए-ज़माना के हाथों पामाल हो चुका था और हलाकत की बिजलियों पर बाद-ए-मुख़ालिफ़ के झोंकों से सल़्तनत-ए-मुग़्लिया की शौकत-ओ-इक़्तिदार के बड़े बड़े टहने टूट-टूट कर गिर रहे… continue reading