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हज़रत शैख़ अ’लाउ’द्दीन क़ुरैशी-ग्वालियर में नवीं सदी हिज्री के शैख़-ए-तरीक़त और सिल्सिला-ए-चिश्तिया के बानी

हिन्दुस्तान की तारीख़ भी कितनी अ’ज़ीब तारीख़ है। यहाँ कैसी कैसी अ’दीमुन्नज़ीर शख़्सियतें पैदा हुईं। इ’ल्म-ओ-इर्फ़ान के कैसे कैसे सोते फूटे।
हिंदुस्तान से अ’रब का तअ’ल्लुक़ एक क़दीम तअ’ल्लुक़ है। मशाएख़ीन-ए-तरीक़त ने अपनी बे-दाग़ ज़िंदगी यहाँ अ’वाम के सामने रखी। यहाँ की बोलियों में उनसे कलाम किया।

बर्र-ए-सग़ीर में अ’वारिफ़ुल-मआ’रिफ़ के रिवाज पर चंद शवाहिद-(आठवीं सदी हिज्री तक)-डॉक्टर आ’रिफ़ नौशाही

शैख़ गंज शकर 569-664 हिज्री) अ’वारिफ़ का दर्स देते थे। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने अ’वारिफ़ के पाँच अबवाब उन्हीं से पढ़े थे। गंज शकर का पढ़ाने का अंदाज़ बहुत दिल-नशीन था और कोई दूसरा उन जैसा अ’वारिफ़ नहीं पढ़ा सकता था। बारहा ऐसा हुआ कि सुनने वाला उनके ज़ौक़-ए-बयान में ऐसा मह्व हुआ कि ये तमन्ना करते पाया गया कि काश उसी लम्हे मौत आ जाए तो बेहतर है। एक दिन ये किताब शैख़ की ख़िदमत में लाई गई तो इत्तिफ़ाक़ से उसी दिन उनके हाँ लड़का पैदा हुआ। शैख़ुश्शुयूख़ के लक़ब की मुनासबत से उस का लक़ब “शहाबुद्दीन” रखा गया।

है शहर ए बनारस की फ़ज़ा कितनी मुकर्रम

महसूस यूँ हुआ कि हम जन्नत में आ गए
कैसी है देखो आज फ़ज़ा कुछ न पूछिए

हज़रत ख़्वाजा गेसू दराज़ चिश्ती अक़दार-ए-हयात के तर्जुमान-डॉक्टर सय्यद नक़ी हुसैन जा’फ़री

जवामिउ’ल-कलिम में मज़कूर है कि एक-बार मौलाना ज़ैनुद्दन दौलताबादी, ख़लीफ़ा मौलाना बुर्हानुद्दीन ग़रीब ने बंदगी-ए-ख़्वाजा से अ’र्ज़ किया कि इस ग़रीब के मरज़-ए-दिल की सेहत के लिए दुआ’ फ़रमाएं तो बंदगी-ए-ख़्वाजा ने अपने दाँतों से उंगली पकड़ ली और फ़रमाया कि मौलाना दिल को मरीज़ न कहिए।

हज़रत मौलाना शाह हिलाल अहमद क़ादरी मुजीबी

शाह हिलाल अहमद साहिब की ज़ात ने ख़ानक़ाही अंदाज़ ओ अतवार को शोहरत दी। ख़ानक़ाही माहौल के साथ मदरसा ओ इफ़्ता के वक़ार में कभी कमी महसूस नहीं होने दिया। हर छोटे बड़े सब से मिला करते थे और अपने उम्दा अख़्लाक़ की वज्ह से बहुत जल्द उनके क़रीब हो जाया करते। अपने इल्म ओ अमल, तक़्वा ओ परहेज़ गारी,आजिज़ी ओ इन्किसारी में अपने अस्लाफ़ के पैरो कार थे। उनकी रिवायतों के अमीन थे। उनकी निगाह अपने अस्लाफ़ को देखा करती थी। उन्होंने कई बुज़ुर्गों का दौर देखा था और उनकी सोहबत भी उठाई थी।

हकीम सय्यद शाह अलीमुद्दीन बल्ख़ी फ़िरदौसी

शाह अलीमुद्दीन बल्ख़ी साहिब ने 1946 ईस्वी का फ़साद भी देखा था। जब मुल्क में क़त्ल ओ ग़ारत का सिलसिला ज़ोरों पर था लोग देही इलाक़ों से शहरों की जानिब कूच कर रहे थे तो उनमें शाह साहिब भी अपने वालिद के साथ फ़तूहा से शहर ए अज़ीमाबाद आने वालों में शरीक थे। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मौलाना अब्दुल-क़ादिर अज़ाद सुबहानी, सर सय्यद अली इमाम बैरिस्टर वग़ैरा की सोहबत ओ संगत भी शाह साहिब को बहुत कुछ ज़िंदगी के अमली मैदान में सिखा गई।