’अज़ीज़ सफ़ीपुरी और उनकी उर्दू शा’इरी

उर्दू की तर्वीज-ओ-इशा’अत और फ़रोग़-ओ-इर्तिक़ा में सूफ़िया-ए-किराम ने जो ख़िदमात पेश कीं वो किसी साहिब-ए-नज़र से पोशीदा नहीं। इस ज़बान को ’अवाम के दरमियान मक़बूल बनाने और इसके अदबी सरमाए को वुस्’अत ’अता करने में उन ख़ुदा-रसीदा बुज़ुर्गों ने इब्तिदा ही से ग़ैर-मा’मूली कारनामे अंजाम दिए हैं।

ये उन्हीं का फ़ैज़ान है कि ज़माना-ए-क़दीम ही से उर्दू का रिश्ता ’अवाम से उस्तवार रहा है। उन्हों ने तब्लीग़-ए-दीन और पंद-ओ-नसाएह के लिए जिन मक़ामी ज़बानों का इंतिख़ाब किया उन में उर्दू को इम्तियाज़ी हैसियत हासिल है। यही वजह है कि तसव्वुफ़-ओ-’इर्फ़ानियात से मुत’अल्लिक़ जो कुतुब-ओ-रसाइल दस्तियाब हैं उन में हिंदुस्तान की दीगर ज़बानों की निस्बत कैफ़ियत और कमिय्यत दोनों जिहतों से उर्दू को अव्वलियत हासिल है। जहाँ तक शा’इरी का मु’आमला है तो ये बात तारीख़ी शवाहिद से ’अयाँ है कि फ़ारसी के बा’द उर्दू शा’इरी ही को ख़ानक़ाहों, दाइरों और तकियों में बारयाबी के मवाक़े’ हासिल हुए जिसके बा’इस ये वहाँ की रूहानी फज़ा में बर्ग-ओ-बार लाती रही, बिल-ख़ुसूस सा’दी, हाफ़िज़, रूमी, ’इराक़ी, जामी, ख़ुसरौ वग़ैरहुम के बा’द जो कलाम महफ़िल-ए-समा’ की ज़ीनत बनते रहे वो सूफ़ियाना अफ़्कार-ओ-ख़यालात पर मबनी उर्दू कलाम ही थे। इसलिए ज़बान-ओ-अदब से मुत’अल्लिक़ सूफ़िया-ए-किराम की ख़िदमत को ब-नज़र-ए-अहसन देखा जाना चाहिए। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, जिसके बा’इस वो अदबी सरमाए जो सूफ़ियाना अफ़्कार-ओ-ख़यालात पर मबनी थे या वो शो’रा जो ब-ज़ात-ए-ख़ुद सूफ़ी थे या जो ख़ानक़ाहों और तकियों से वाबस्ता थे वो तक़रीबन भुला ही दिए गए और अदबी दुनिया में उनकी हैसियत बुझते हुए चराग़ की सी हो कर रह गई। उन्हीं फ़रामोश-शुदा शो’रा-ओ-उदबा की फ़ेहरिस्त में एक रौशन और बा-वक़ार नाम हज़रत ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी का भी है।

हज़रत ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी का अस्ल नाम विलायत अ’ली ख़ाँ है लेकिन ’इल्मी-ओ-अदबी दुनिया में वो ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी के नाम से मशहूर हुए। उनके नाम में ब-तौर-ए-लाहिक़ा लफ़्ज़ “ख़ान” उनके हसब या नसब की ’अलामत नहीं है बल्कि ख़िताबी है। ’अक़ाइद-उल-’अज़ीज़ में दर्ज मज़मून ब-’उनवान “अज़ीज़ुल्लाह सफ़ीपुरीः हयात-ओ-ख़िदमात” के मुताबिक़ उनका सिलसिला-ए-नसब हज़रत सिद्दीक़-ए-अकबर रज़ी-अल्लाहु ’अन्हु तक पहुँचता है। मा’रूफ़ मुहक़्क़िक़ मालिक राम ने “तलामिज़ा-ए-ग़ालिब” में उन्हें शैख़ सिद्दीक़ी लिखा है और उनके सिलसिला-ए-नसब से मुत’अल्लिक़ ये वज़ाहत की है कि वो ख़वाजा ’उस्मान हारूनी की औलाद से थे जो ख़्वाजा मु’ईनुद्दीन चिश्ती के पीर-ओ-मुरीद हैं। उनकी वालिदा शैख़ महबूब ’आलम सफ़वी (अज़ मख़दूम-ज़ादगान-ए-सफ़ीपुर) की दुख़्तर थीं। चूँकि शैख़ महबूब-ए-’आलम का सिलसिला-ए-नसब हज़रत ’उमर फ़ारूक़ रज़ी-अल्लाहु ’अन्हु से मिलता है, इस ’एतबार से हज़रत ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी निस्बतन सिद्दीक़ी और हसबन फ़ारूक़ी ठहरते हैं। उन्होंने शा’इरी में इब्तिदाअन अपने नाम ही को या’नी ‘विलायत’ ब-तौर-ए-तख़ल्लुस इख़्तियार किया, लेकिन जब उन्हों ने मुर्शिद–ए-बर-हक़ हज़रत शाह मख़दूम ख़ादिम सफ़ीपुरी के दस्त–ए- हक़-परस्त पर बै’अत की तो उनके मुर्शिद ने उनका नाम ’अज़ीज़ुल्लाह शाह रख दिया। इजाज़त-ओ-ख़िलाफ़त से क़ब्ल वो विलायत ही तख़ल्लुस फ़रमाते रहे, लेकिन ख़िलाफ़त मिलने के बा’द उन्हों ने अपने मुर्शिद की हुक्म की ता’मील करते हुए उन्हीं के ’अता-कर्दा नाम के एक जुज़्व या’नी ’अज़ीज़ को अपना तख़ल्लुस बना लिया। 1286 हिज्री में आपके मुर्शिद ने ख़िलाफ़त ’अता की। इससे ये ज़ाहिर होता है कि उसके बा’द ही आप ने ’अज़ीज़ तख़ल्लुस इख़्तियार किया ।इस तअ’ल्लुक़ से मालिक राम लिखते हैः

“शुरु’ में तख़ल्लुस विलायत था। लेकिन जब हज़रत शाह ख़ादिम सफ़ी मोहम्मदी के हाथ पर बै’अत की तो उन्हों ने नाम बदल के मोहम्मद ’अज़ीज़ुल्लाह शाह और तख़ल्लुस ’अज़ीज़ कर दिया”।

हज़रत शाह ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी का ख़ानदानी पस-मंज़र निहायत ही शानदार रहा है। अव्वलन उनका ख़ानदान क़न्नौज में सुकूनत-पज़ीर था और शाह इब्राहीम शर्क़ी के ज़माने तक उस ख़ानदान के अफ़राद वहीं रहे लेकिन जब शाह इब्राहीम की सल्तनत ज़वाल-पज़ीर हुई तो उनके मोरिस-ए-आला मुंशी फ़ैज़ मोहम्मद क़न्नौज से मझगावां (ज़ि’ला हरदोई) मुंतक़िल हो गए। ये नवाब आसिफ़ुद्दौला का ज़माना था। मुंशी फ़ैज़ मोहम्मद लखनऊ गए और उनके वज़ीर अमीरुद्दौला मिर्ज़ा हैदर बेग के पेश-दस्त मुक़र्रर हो गए। उसके बा’द ये ख़ानदान मुस्तक़िल तौर पर लखनऊ का हो के रह गया। ये ख़ानदान 1857 ’इस्वी तक वहीं इक़ामत-पज़ीर रहा लेकिन हंगामा-ए-ग़दर में शाही ’इमारतों के साथ उनका घर भी तबाह-ओ-बर्बाद हो गया तो मजबूरन उन के वालिद यहया ’अली ख़ाँ सफ़ीपुर आ गए और यहीं मुस्तक़िल क़ियाम-पज़ीर हो गए जहाँ उनकी शादी शैख़ महबूब ’आलम की दुख़्तर-ए-नेक-अख़तर से हुई। इन्हीं  के बत्न से ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी की विलादत 6 सफ़र 1259 हिज्री मुताबिक़ 1884 ’इस्वी को अपने ननीहाल सफ़ीपुर में हुई। उनकी रस्म-ए-बिस्मिल्लाह लखनऊ में हुई। इस रस्म की अदाएगी हज़रत मौलाना ’अब्दुल-वाली फ़िरंगी महल्ली ने कराई। अपनी इब्तिदाई ता’लीम का आग़ाज़ वालिद माजिद के ज़ेर-ए-साया किया, उस के बा’द कुझ दिनों तक मौलाना मोहम्मद हसन बंगाली से इस्तिफ़ादा-ए-’इल्मी किया फिर मौलाना मोहम्मद रज़ा बाँगरमवी से ता’लीम हासिल की। वो ‘आला दर्जे के हकीम भी थे और उसकी तहसील मौलाना हकीम हिदायतुल्लाह सफ़ीपुरी से की थी।

हज़रत ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी का शुमार अपने ’अहद की बा-कमाल ’इल्मी शख़्शियतों में होता है। वो कसीरुत्तसानीफ़ ’आलिमों में थे। मुख़्तलिफ़ ’उलूम-ओ-फ़ुनून पर उन्हों ने दर्जनों तसानीफ़ ब-तौर-ए-यादगार छोड़ी हैं। जो ’अरबी, फ़ारसी और उर्दू में हैं। ’अक़ाएदुल ’अज़ीज़ में दर्ज मज़मून ब-’उन्वान शाह ’अज़ीज़ुल्लाह सफ़ीपुरीः हयात-ओ-ख़िदमात के मुताबिक़ उनकी फ़िहरिस्त मुंदरजा ज़ैल हैः

अरबीः

  1. मुक़द्दमा मख़्ज़नुल-विलायत-वल-जमाल (मत्बू’आ)
  2. मुंशआत-उल-’अज़ीज़ (ग़ैर-मत्बू’आ)

दीवानहा-ए-फ़ारसीः

  1. ए’जाज़ुत्तवारीख़
  2. बयानुत्तवारीख़
  3. दीवान-ए-ख़त्म-ए-फ़िक्र-ए-फ़ारसी
  4. दीवान-ए-’अज़ीज़
  5. दीवान-ए-ना’त-ए-महबूब
  6. दीवान-ए-नूर-ए-तजल्ली
  7. दीवान-ए-विलायत
  8. मिर्अतुस्सनाए’

मस्नवियात-ए-फ़ारसीः

  1. ए’जाज़-ए-मोहम्मदी
  2. जज़्बा-ए-’इश्क़
  3. जल्वा-ए-हुस्न
  4. हसरत-ए-दिल
  5. ख़बर-ए-ख़ैबर
  6. रम्ज़ुश्शहादतैन
  7. शो’ला-ए-मोहब्बत
  8. फ़त्ह-ए-मुबीन
  9. माह-ए-शब-अफ़रोज़

कुतुब-ए-नस्र-ए-फ़ारसीः

  1. अरमुग़ान
  2. पेशकश-ए-शाहजहानी
  3. पंज रुक़’आ-ए-विलायत
  4. मख़्ज़नुल-विलायत-वल-जमाल
  5. नसरा
  6. निगारिश-ए-’आरी

दीवानहा-ए-उर्दूः

  1. ख़त्म फ़िक्र-ए-उर्दू
  2. नज़्म–ए-दिल-फ़रेब (ग़ज़लों का मज्मू’आ)
  3. तूर-ए-तजल्ली (ना’तिया ग़ज़लों पर मुश्तमिल)
  4. नूर-ए-विलायत (सूफ़ियाना ग़ज़लों पर मुश्तमिल मजमू’आ-ए-कलाम)

नस्रहा-ए-उर्दूः

  1. अश्’आ’रुल-अश्’आर
  2. ईमानुल-ग़ुरबा
  3. ता’लीमुल-मुख़्लिसीन
  4. तंबीहुल-मो’तदिल-अल-मना’
  5. ज़िक्रुल-हबीब
  6. सवानेह-ए-अस्लाफ़
  7. ’अक़ाएदुल-’अज़ीज़
  8. ’ऐनुल-विलायत
  9. ’इरफ़ान-ए-’अज़ीज़ और

अल-मसादिर

’अलावा अज़ीं तीन शे’री मजमू’ए

  1. शान-ए-’अज़ीज़
  2. ’इरफ़ान-ए-’अज़ीज़ और
  3. नग़्मा-ए-शिफ़ा’अत

उनके मुरीदों और ’अक़ीदत-मंदों ने उनके दवावीन से मुंतख़ब कलाम कर के शाए’ कराए हैं जो ’अज़ीज़-शनासी के बाब में बड़ी अहमियत के हामिल हैं।

13 मुहर्रम रोज़-ए-दो-शंबा ब-वक़्त-ए-सुब्ह-ए-सादिक़ 1347 हिज्री मुताबिक़ 2 जुलाई 1928 ’इस्वी को सफ़ीपुर में उनका विसाल हुआ और वहीं अपने पीर-ओ-मुर्शिद की बारगाह के मशरिक़ी दरवाज़े के क़रीब सुपुर्द-ए-ख़ाक हुए।

ख़ुलफ़ा:

आपके ख़ुलफ़ा की ता’दाद 10 है, जिनके बारे में मलिक मोहम्मद रफ़ीक़ वलद ’इबाद ’अली अपने मज़मून ब-’उन्वानः “ज़िक्र-ए-ख़ैर-ए- मुर्शिद-ए-बरहक़ नूर-ए-मुत्लक़ महबत-ए-अनवार-ए-एज़दी महरम-ए-असरार-ए-सर्मदी हज़रत मोहम्मद ’अज़ीज़ुल्लाह शाह ’उर्फ़ मुंशी विलायत ’अली ख़ाँ साहब “विलायत” सफ़ीपुरी ज़िला’ उन्नाव अपनी किताब में रक़म-तराज़ हैं:

“आपने दस आदमियों को ख़िलाफ़त दी जिस (जिन) में से पाँच आप के मुरीद हैं और ख़लीफ़ा भी। और पाँच महज़ तालिब और ख़लीफ़ा हैं। अव्वलन बिरादर-ए-’अज़ीज़ शाह ख़ादिम ’अली साहिब, दूसरे शाह ख़ादिम मोहम्मद साहिब,सज्जादा मख़दूम शाह सफ़ी साहिब रहमतुल्लाह ’अलैह, तीसरे शाह दानिश ’अली साहिब,सज्जादा-नशीं मंझकुवाँ शरीफ़ जो मुरीद और ख़लीफ़ा शाह ख़ादिम मोहम्मद साहिब रहमतुल्लाह ’अलैह के हैं। ब-मोजिब-ए-वसियत-ए-शाह ख़ादिम मोहम्मद साहिब आपने भी ता’लीम  फ़रमा कर अपनी तरफ़ से भी इजाज़त मरहमत फ़रमाई और नाम शाह फ़ैज़ ख़ादिम रखा, चौथे ’अज़ीज़ुल हक़ रहमतुल्लाह ’अलैह, पीर-ज़ादा सफ़ीपुर शरीफ़ जो आपके मुरीद-ओ-ख़लीफ़ा थे। अफ़्सोस आपका भी विसाल पीर-ओ-मुर्शिद की हयात में हो गया। आफका नाम शाह ’अज़ीज़ ख़ादिम था। पाँचवें शाह लुत्फ़ हुसैन साहिब ,साकिन मौज़ा’ मूसंड़ ज़िला’ बाराबंकी, आप भी मुरीद और ख़लीफ़ा हैं। आपका नाम शाह अल्ताफ़ ख़ादिम है। छट्ठे रमज़ान ’अली साहिब, साकिन बारी थाना ज़िला’ उन्नाव है। आपका नाम हबीबुल्लाह शाह रखा।आप भी मुरीद और ख़लीफ़ा हैं। सातवें शाह बासित ’अली साहिब। आप अपने वालिद के मुरीद और ख़लीफ़ा हैं। हज़रत ने भी इजाज़त दी और ता’लीम किया। आठवें शाह इकरामुल-हक़ साहिब, बाशिंदा बाँकेपुर पटना जो फुलवारी शरीफ़ में किसी बुज़ुर्ग के मुरीद हैं। आपने इनको भी इजाज़त दे कर नाम अकरमुल्लाह शाह रखा। नवें शाह तालिब सफ़ी ।आप क़ुल-हुवल्लाह शाह के मुरीद-ओ-ख़लीफ़ा हैं। आप ने इनको भी इजाज़ा दी और ये पेशावर के क़रीब रहते हैं। और दसवें डॉ. हाजी मोहम्मद एहसान अली सफ़ीपुरी।ये मुरीद भी और ख़लीफा भी। आपका नाम शाह एहसान ख़ादिम रखा। ’अलावा इन सब हज़रात के एक साहिब को ब-ज़रिआ’-ए-तहरीर भी इजाज़त ’अता फ़रमाई। उनका क़ियाम ग्वालियर में है और नाम अहमदुल्लाह शाह है। ये क़ुल-हुवल्लाह शाह के ख़ानदान में मुरीद हैं।”

एक शा’इर की हैसियत से भी उनका पाया निहायत ही बुलंद है। उन्हों ने उर्दू और फ़ारसी दोनों ज़बानों में दाद-ए-सुख़न दी। फ़ारसी में मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ग़ालिब देहलवी से इस्लाह ली जिसका ’ऐतराफ़ उन्हों  ने अपने एक उर्दू क़ित’आ में इस तरह किया हैः

मम्नून मैं नहीं हूँ किसी के कमाल का

शागिर्द इस ज़बाँ में हूँ उस ज़ुल-जलाल का

हाँ नज़्म-ए-फ़ारसी में हूँ ग़ालिब से मुस्तफ़ीद

मुद्दत-गुज़ार-ए-लुत्फ़ हूँ दो तीन साल का

भेजी थी एक नस्र-ए-मुतव्वल भी चार जुज़्व

हूँ मो’तक़िद मैं दोनों में उनके कमाल का

लिखा कि इस में हक्क-ओ-तसर्रुफ़ की जा नहीं

हरगिज़ महल नहीं है किसी एहतिमाल का

बस नस्र में भी मुझको तलम्मुज़ जो है तो ये

इस में भी मो’तरिफ़ हूँ ख़ुदा के नवाल का

इस क़ित’आ से ये ज़ाहिर है कि उन्हों ने उर्दू शा’इरी में किसी उस्ताद के सामने जानू-ए-तलम्मुज़ तह नहीं किया और अपनी फ़ित्री सलाहियतों को बुनियाद बना कर शा’इरी करते रहे। सिर्फ़ फ़ारसी में दो तीन बरस तक वो ग़ालिब से इस्तिफ़ादा करते रहे। ’अलावा अज़ीं उन्होंने फ़ारसी की एक नस्री तहरीर ग़ालिब की ख़िदमत में ब-ग़र्ज़-ए-इसलाह इर्साल फ़रमाई जिसको देख कर ग़ालिब बहुत ख़ुश हुए और ग़ालिब ने जवाब में ये लिखा कि इनमें हक्क-ओ-तसर्रुफ़ की गुंजाइश नहीं।

ये बात ग़ालिब के एक ख़त से ज़ाहिर है जो उन्हों ने मज़्कूरा फ़ारसी तहरीर के जवाब में लिखा और जो उनकी किताब सवानेह-ए-अस्लाफ़ में मौजूद है। ये ख़त इस तरह हैः

‘’आपका मेहरबानी-नामा आया, औराक़-ए-पंज रुक़’आ नज़र अफ़रोज़ हुए। ख़ुशामद फ़क़ीर का शेवा नहीं, निगारिश तुम्हारी पंज रुक़’आ-ए-साबिक़ से लफ़ज़न-ओ-मा’नन बढ़ कर है ,उस में ये मा’नी-ए-नाज़ुक और अल्फ़ाज़-ए-आब-दार कहाँ? मूजिद से मुक़ल्लिद बेहतर निकला। या’नी तुम ने ख़ूब लिखाः

नक़्क़ाश नक़्श-ए-सानी बेहतर कशद ज़ अव्वल

जहाँ आप ने फ़क़ीर का मतला’ लिखा है, वहाँ आप ब-’उर्फ़ मेरे मा’रूफ़ हुए हैं। मुतवक़्क़े’ हूँ कि मेरा शे’र निकाल डालो या ’उर्फ़ की जगह तख़ल्लुस लिख दो।”

नजात का तालिब

ग़ालिब

सुतूर-ए-बाला में जिस फ़ारसी नस्र का ज़िक्र किया  गया है उसके त’अल्लुक़ से मालिक राम लिखते हैं:

“यहाँ जिस नस्र की तरफ़ इशारा है, ये उन्हों ने मुंशी इरादत ख़ान ’आलमगीर के पंज रुक़’अ के जवाब में 18-17 बरस की ’उम्र में “पंज रुक़’आ-ए-विलायत” के ’उन्वान से लिखी थी। लाला श्री राम का बयान है कि ये नस्र उन्हों ने अपने शागिर्द मुंशी ठाकुर प्रसाद तालिब के लिए तस्नीफ़ की थी।”

बहर-हाल, हज़रत ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी ने उर्दू और फ़ारसी दोनों ज़बानों को अपने शे’री इज़्हार का वसीला बनाया और मज़्कूरा दोनों ज़बानों में अपनी क़ादिर-उल-कलामी और नग़्ज़-गोई के आसार-ओ-आयात छोड़े। फ़ारसी शा’इरी में उनकी महारत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हों ने 50 अश्’आर पर मुश्तमिल ना’तिया क़सीदा मिर्अतुस्सना’ए के ’उन्वान से कहा और उसे अपने फ़ारसी शा’इरी के उस्ताद मिर्ज़ा ग़ालिब की ख़िदमत में ब-ग़र्ज़-ए-इस्लाह इर्साल फ़रमाया तो उन्हों ने न सिर्फ़ उसको पसंदीदगी की निगाह से देखा बल्कि सन’अत-ए-तजनीस में एक मतला’ कह के उस में इज़ाफ़ा भी किया नीज़ उससे मुतअस्सिर हो कर ख़ुद भी उस ज़मीन में क़सीदा कहने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की। इस वाक़िए’ से इस अम्र का सुराग़ मिलता है कि फ़ारसी शा’इरी में उनका मक़ाम निहायत ही बुलंद है, लेकिन यहाँ सिर्फ़ उनकी उर्दू शा’इरी से मुत’अल्लिक़ ख़ामा-फ़रसाई की जा रही है।

हज़रत ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी को ग़ज़ल से फ़ित्री मुनासबत है । यही वजह है कि उन्हों ने अपने मा-फ़िज़्ज़मीर की अदाइगी के लिए ग़ज़ल की सिन्फ़ को तरजीह दी है। उन्हों ने ख़ासी ता’दाद में ग़ज़लें कहीं हैं। ख़ालिस ग़ज़ल के ’अलावा उन्हों ने अपनी ना’तिया शा’इरी के लिए जिस शे’री हैयत का इंतिख़ाब किया है वो भी ’उमूमन ग़ज़ल ही की हैयत है। इसलिए उन की शा’इरी का जाएज़ा ग़ज़ल के तंक़ीदी पैमाने पर ही लेना मेरे ख़याल में ज़्यादा मौज़ूँ-ओ-मुनासिब होगा।

हज़रत ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी की ग़ज़लों के मुतालि’ए से ये बात अज़ ख़ुद ज़ेहन पर मुनकशिफ़ होती है कि उनकी ग़ज़लिया शा’इरी’ आम रविश से बिलकुल जुदागाना रंग-ओ-आहंग की हामिल है। अगरचे ग़ज़ल की शा’इरी में शाइ’राना तख़य्युल की अहमियत अपनी जगह है और उससे हमारी ग़ज़ल माया-दार हुई है, लेकिन हज़रत ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी ने ग़ज़ल की रिवायती डगर से इंहिराफ़ करते हुए उस में नई धज पैदा करने की कोशिश की है। उनकी ग़ज़लों में तख़य्युल की रा’नाई की जगह हक़ीक़त की जल्वा-फ़रमाई नज़र आती है। वो अपनी ग़ज़लों में हुस्न-ओ-’इश्क़, शम्अ’-ओ-परवाना, गुल-ओ-बुलबुल, हिज्र-ओ-विसाल जैसे फ़र्सूदा और पामाल मज़ामीन बाँधने से गुरेज़ करते हैं। उनके अश्’आर के मा’नवी आ’माक़-ओ-जिहात पर ग़ौर करने के बा’द ये अंदाज़ा होता है कि वो अपने शे’रों के ज़रिए’ तसव्वुफ़-ओ-’इरफ़ानियात के मुख़्तलिफ़ुन्नौ’ मसाइल की गिरह-कुशाई कर रहे हैं।

चूँकि हज़रत ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी एक सूफ़ी मुंश शा’इर थे और उन्हों ने अपनी ग़ज़लों में अपने अफ़्कार-ओ-ख़यालात ،तजरिबात-ओ-मुशाहदात और एहसासात-ओ-जज़्बात का बर-मला इज़्हार किया है जिसके बा’इस उनकी ग़ज़लों में सूफ़ियाना रंग-ओ-आहंग की जल्वा-सामानी ग़ालिब रुजहान के तौर पर पाई जाती है। वो मा’रिफ़त-ए-इलाही के मुख़्तलिफ़ुल-लौन निकात, ’इरफ़ान-ए-मक़ाम-ए-नुबुव्वत, इरादत-ए-शैख़ और ख़ुद-आगही का ज़ौक़ जैसी चीजों से अपने निगार-ख़ाना-ए-फ़न की तहज़ीब-ओ-तश्कील करते हैं जिसकी वजह से उनकी ग़ज़लें ’आम ग़ज़लों सी नहीं रह जाती बल्कि वो मा’रिफ़त-ए-इलाही का सर-चश्मा बन जाती हैं। अपने दा’वे की दलील के तौर पर उनकी चंद ग़ज़लें पेश कर देना मुनासिब समझता हूँ।

शगुफ़्ता है बहारों से ये गुलज़ार-ए-जहाँ कैसा

तमाशा देखो हर गुल का न पूछो ये कि हाँ कैसा

मकाँ है एक त’अय्युन ला-मकाँ भी इक त’अय्युन है

वही मौजूद है बे-शक मकान-ओ-ला-मकाँ कैसा

वही दुनिया में दाइर है वही ’उक़्बा में साइर है

वही दोनों में ज़ाहिर है ज़मीं कैसी ज़माँ कैसा

कहाँ है नहनु-ओ-अक़रब साफ़-साफ़ आमन्तु बिल-क़ुरआँ

’अज़ीज़ुल्लाह ने खोला है ख़ुद राज़-ए-निहाँ कैसा

ज़रा दोखो कि कुन कहने से ये ’आलम बना कैसा

न था मौजूद और उसके इरादे से हुआ कैसा

जहाँ वो है वहाँ अल्लाह बस अल्लाह बस या हू

ज़माइर हैं मज़ाहिर अन्ता कैसा और अना कैसा

उसी की आँख से गुम उसको बे-चूँ-ओ-चरा देखो

वो इक ज़ात-ए-मुक़द्दस है वहाँ चूँ-ओ-चरा कैसा

मोहम्मद मज़हर-ए-हक़ और दो’आलम उन के मज़हर हैं

बनाया आईना उनको हुआ वो रूनुमा कैसा

अनल-हक़ क्या है इक अल्लाह के दीदार का रौज़न

’अज़ीज़ इद्राक से मख़्फ़ी है ये सब माजरा कैसा

यही सूरत निशान-ए-बे-निशाँ है

इसी पर्दे में नूर-ए-ला-मकाँ है

वो मेरे पास है मुझ से ज़्यादा

जुदाई मुझ में और उस में कहाँ है

अनल-हक़ और हुवल-हक़ एक ही है

ये मिल्लत मिल्लत-ए-पीर-ए-मुग़ाँ है

वही ज़ाहिर है और ये दोनों मज़हर

वही है जिस्म-ओ-जाँ और जान-ए-जानाँ है

’अज़ीज़ुल्लाह हम ख़ादिम सफ़ी हम

सुनो मुझ से यही सिर्र-ए-निहाँ है

मुहव्वला ग़ज़लों के अश्’आर की मा’नवी तहों में उतरने के बा’द इस नुक्ते की वज़ाहत होती जाती है कि उन में कहीं ’इरफ़ान-ए-ख़ुदावंदी, कहीं ’इरफ़ान-ए-मक़ाम-ए-नुबुव्वत, कहीं ’इरफ़ान-ए-मर्तबा-ए-शैख़ और कहीं ’इरफ़ान-ए-ख़ुदी के त’अल्लुक़ से ख़यालात का इज़्हार किया गया है। ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी की पूरी शा’इरी इन्हीं चारों ख़ुतूत पर अपने इर्तिक़ाई मराहिल तय करती है।

एक ख़ालिस ना’त-गो की हैसियत से भी उनका मक़ाम अर्फ़ा’-ओ-आ’ला है। उन्होंने अपनी ना’तों में रसूल-ए-गिरामी हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सलल्ललाहु ’अलैहि वसल्लम से अपनी ’अक़ीदत-ओ-मोहब्बत का इज़्हार और उनके मक़ाम-ओ-मर्तबा का बयान जिस अंदाज़ में किया है वो उनके ’आशिक़-ए-रसूल होने पर दलालत करता है। उन्होंने कसीर ता’दाद में ना’तें कही हैं। इसलिए उनकी ना’तिया शा’इरी का कमा-हक़्क़हु मुहाकमा करने के लिए पूरा पी.एच.ड़ी का मक़ाला दरकार है, इसलिए मैं सिर्फ़ उनकी चंद ना’तें मुश्ते नमूना अज़ ख़रवारे के मिस्दाक़ पेश कर के उनकी ना’तिया शा’इरी के मे’यार से क़ारिईन को आगाह करने की कोशिश कर रहा हूँ।

मुस्हफ़-ए-पाक है कौनैन में हुज्जत तेरी

हक़-तआ’ला की इता’अत है इता’अत तेरी

कुंतु कंज़न से हुवैदा है हक़ीक़त तेरी

नूर-ए-बे-कैफ़ का आईना है सूरत तेरी

हश्र में होगी तेरी शान-ए-मु’अज़्ज़म ज़ाहिर

पेशतर जाएगी फ़िरदौस में उम्मत तेरी

जिसने देखा तुझे अल्लाह को पहचान लिया

सिर्र-ए-तौहीद की मुस्बित है रिसालत तेरी

जान देते हैं तिरी राह में मरने वाले

फ़र्ज़ है मज़हब-ए-’उश्शाक़ में सुन्नत तेरी

नूर-ए-हक़ क्यूँ न समा जाए तिरे दिल में ’अज़ीज़

कैसे महबूब पे आई है तबी’अत तेरी

’अर्श-ए-आ’ज़म पर पहुँचने से नबी का क्या शरफ़

बढ़ गया पा-ए-नबी से ’अर्श-ए-आ’ज़म का शरफ़

उसके जाने से फ़रोग़-ए-ला-मकाँ ज़ाहिर हुआ

गर न जाता वो न पाता ’आलम-ए-बाला शरफ़

ख़ुद शरफ़ उस की हिमायत से मुशर्रफ़ हो गया

हक़ ने बख़्शा सय्यद-ए-अबरार को कैसा शरफ़

वो हुआ ख़ातिम तो आए अपने अपने ’अहद में

अंबिया ने उसकी ज़ात-ए-पाक से पाया शरफ़

हक़ ने फ़रमाया है सुब्हानल्लज़ी असरा’ अज़ीज़

इसके मा’नी में तअम्मुल कर कि है कितना शरफ़

मुख़्तसर ये कि हज़रत ’अज़ीज़ सफ़ीपुरी एक बा-कमाल शा’इर हैं। उनको शा’इरी के फ़न्नी असरार-ओ-रुमूज़ पर क़ुदरत-ए-कामिला हासिल है। उन्होंने अपनी शा’इरी के लिए बेशतर मुतरन्निम बुहूर का इस्ति’माल किया है जिसकी वजह से उन के शे’र में ग़िनाइय्यत और जज़्ब-ओ-कशिश की कैफ़ियत अज़ ख़ुद पैदा हो गई है। उनकी शा’इरी हमारी तवज्जोह अपनी तरफ़ खींचती है। गर्द-ए-अय्याम ने उनकी शा’इरी की चमक-दमक को मुज़्महिल कर दिया है। इसलिए ज़रूरी है कि उनके उर्दू और फ़ारसी कलाम को जदीद उसूल-ए-तहक़ीक़ के मुताबिक़ तर्तीब दे कर अज़ सर-ए-नव शा’ए कराया जाए ताकि अदबी दुनिया में उनका जदीद त’आरुफ़ हो।

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