Articles By Sufinama Archive

Sufinama Archive is an initiative to reproduce old and rare published articles from different magazines specially on Bhakti movement and Sufism.

हज़रत बाबा फ़रीद गंज शकर के तबर्रुकात-मौलाना मुफ़्ती नसीम अहमद फ़रीदी

अमरोहा, उत्तर प्रदेश के ज़िला’ मुरादाबाद के एक मशहूर-ओ-मा’रूफ़ और क़दीम तारीख़ी क़स्बा का इब्न-ए-बतूता ने अपने  सफ़र-नामा में अपने अमरोहा आने का ज़िक्र किया है। इस क़स्बा की बहुत सी तारीखें मुख़्तलिफ़ ज़बानों में लिखी गई हैं। यहाँ हर फ़न के अहल-ए-कमाल पैदा हुए हैं। यहाँ के मशाइख़-ओ-उ’लमा और अतिब्बा-ओ-शो’रा ने हिन्दुस्तान में और हिन्दुस्तान… continue reading

समाअ’ और आदाब-ए-समाअ’-मुल्ला वाहिदी साहब,देहलवी

आप पत्थर पर लोहे की हथौड़ी मारिए  पत्थर से आग निकलेगी इतनी आग कि जंगल के जंगल जला कर भस्म कर दे।यही हाल इन्सान के दिल का है। उस पर भी चोट पड़ती है तो ख़ाली नहीं जाती।इन्सानी दिल पर चोट लगाने वाली चीज़ों में एक बहुत अहम चीज़ ख़ुश-गुलूई और मौज़ूँ-ओ-मुनासिब तरन्नुम है।इन्सानी दिल में आग… continue reading

क़व्वाली का माज़ी और मुस्तक़बिल

हज़रत ख़ाजा-ए-ख़्वाज-गान के वक़्त से आज तक हिन्दुस्तान में क़व्वाली की मक़्बूलियत कभी कम नहीं हुई बल्कि इसमें दिन-ब-दिन इज़ाफ़ा होता रहा।आज-कल तो ये कहना ग़लत नहीं होगा कि मौसीक़ी की कोई भी फ़ार्म क़व्वाली के बराबर अ’वाम-ओ-ख़्वास में मक़्बूल नहीं है।लेकिन क़व्वाली के दाएरे को जो वुस्अ’त मौजूदा दौर में मिली है उसका एक… continue reading

हज़रत ख़्वाजा नूर मोहम्मद महारवी-प्रोफ़ेसर इफ़्तिख़ार अहमद चिश्ती सुलैमानी

पैदाइश-ओ-ख़ानदान क़िब्ला-ए-आ’लम हज़रत ख़्वाजा नूर मोहम्मद महारवी रहमतुल्लाहि अ’लैह की विलादत-ए-बा-सआ’दत 14 रमज़ानुल-मुबारक 1142 हिजरी 2 अप्रैल 1730 ई’स्वी को मौज़ा’ चौटाला में हुई जो महार शरीफ़ से तीन कोस के फ़ासला पर है। आपके वालिद-ए-गिरामी का इस्म-ए-मुबारक हिन्दाल और वालिदा-ए-मोहतरमा का नाम आ’क़िल बी-बी था।आपके वालिद-ए-गिरामी पहले मौज़ा’ चौटाला में रहते थे। आपके तीन भाई मलिक सुल्तान, मलिक बुर्हान और मलिक अ’ब्दुल… continue reading

याद रखना फ़साना हैं ये लोग-अज़ भारत रत्न डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन ख़ाँ

तारीख़ दो तरह की होती है।एक वाक़ई’ तारीख़ जो बड़ी तलाश-ओ-तहक़ीक़,बड़ी छान-बीन के बा’द किताबों में लिखी जाती है और एक अफ़्सानवी तारीख़ जो तख़य्युल के बू-क़लमूँ और जज़्बात के रंगों से अ’वाम के दिलों पर नक़्श होती है।सल्तनत-ए-मुग़लिया में बड़े बड़े अ’ज़ीमुश्शान,जलीलुल-क़द्र,ऊलुल-अ’ज़्म बादशाह गुज़रे हैं जिनमें से हर एक उस अ’ह्द की दास्तान का… continue reading

हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन मुनव्वर निज़ामी

क़दीम तअ’ल्लुक़ हज़रत सुल्तानुल-मशाइख़ महबूब-ए-इलाही के मुरीदों और ख़ुलफ़ा में दो बुज़ुर्ग ऐसे हैं जिनको कई पुश्त से निस्बत की सआ’दत हासिल थी।एक हज़रत बाबा साहिब के नवासे हज़रत ख़्वाजा सय्यिद मोहम्मद इमाम निज़ामी बिन हज़रत ख़्वाजा बदरुद्दीन इस्हाक़ और दूसरे हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन मुनव्वर इब्न-ए-ख़्वाजा बुर्हानुद्दीन बिन हज़रत ख़्वाजा जमालुद्दीन हान्स्वी ।हज़रत ख़्वाजा जमाल… continue reading

अबू मुग़ीस हुसैन इब्न-ए-मन्सूर हल्लाज- हज़रत मैकश अकबराबादी

मंसूर  हल्लाज रहमतुल्लाह अ’लैह की शख़्सियत फ़ारसी और उर्दू शाइ’री का भी मौज़ूअ’ रही है, इसलिए इस बारे में क़दरे तफ़्सील की ज़रूत है।उ’लमा-ए-ज़ाहिर के अ’लावा ख़ुद सूफ़ियों में मंसूर के मुतअ’ल्लिक़ मुख़्तलिफ़ नुक़्ता-हा-ए-नज़र मिलते हैं।फ़ारसी शाइ’रों में शैख़ फ़रीदुद्दीन अ’त्तार रहमतुल्लाह अ’लैह और मौलाना रूम उनके बड़े ज़बरदस्त मो’तक़िदीन में से हैं। लेकिन अंदर… continue reading

तसव़्वुफ-ए-इस्लाम – हज़रत मैकश अकबराबादी

तसव्वुफ़ कुछ इस्लाम के साथ मख़्सूस और उसकी तन्हा ख़ुसूसियत नहीं है।अलबत्ता इस्लामी तसव्वुफ़ में ये ख़ुसूसियत ज़रूर है कि दूसरे मज़ाहिब की तरह इस्लाम में तसव्वुफ़ मज़हब के ज़ाहिरी आ’माल और रस्मों के रद्द-ए-अ’मल के तौर पर पैदा नहीं हुआ है बल्कि इब्तिदा ही से इस्लाम दुनिया के सामने ज़ाहिर-ओ-बातिन के मज्मुए’ के ब-तौर… continue reading

हज़रत मुल्ला बदख़्शी- पंडित जवाहर नाथ साक़ी देहलवी

नाम शाह मोहम्मद और लक़ब लिसानुल्लाह मा’रूफ़ ब-मुल्लाह शाह क़ादरी था। नूरुद्दीन मोहम्मद जहाँगीर बादशाह के अ’ह्द  मे ब-आ’लम-ए-तुफ़ूलियत वारिद-ए-कश्मीर हुए। तीन साल वहाँ क़याम रहा। वहाँ से आगरे पहुंचे।यहाँ हज़रत मियाँ नमीर सेसनाई क़ादरी लाहौरी सुनार जिनके ख़वारिक़-ए-आ’दात-ओ-करामात ने उनको मश्हूर-ए-ज़माना कर रखा था की सोहबत इख़्तियार की।आख़िर लाहौर तशरीफ़ ले गए।उनकी ख़िदमत में… continue reading

लोकगाथा और सूफ़ी प्रेमाख्यान-परशुराम चतुर्वेदी

हिन्दी के सूफ़ी-प्रेमाख्यानों का विषय प्रारम्भ से ही लोक-कथाओं जैसा रहता आया था। अतः इन्हें साहित्यिक लोकगाथा मान लेने की प्रवृत्ति स्वाभाविक ही है। तदनुसार इसके लिए अनेक उपयुक्त लक्षण भी निर्दिष्ट किये जा सकते हैं। उदाहरणार्थ, कहा जा सकता है कि मुल्ला दाऊद से ले कर ईसवी सन् की बीसवीं शताब्दी के कवि नसीर… continue reading