Articles By Sufinama Archive

Sufinama Archive is an initiative to reproduce old and rare published articles from different magazines specially on Bhakti movement and Sufism.

हिन्दुस्तानी तहज़ीब की तश्कील में अमीर ख़ुसरो का हिस्सा- मुनाज़िर आ’शिक़ हरगानवी

जब हम हिन्दुस्तान की तहज़ीब का मुतालिआ’ करते हैं तो देखते हैं कि तरह तरह के इख़्तिलाफ़ के बावजूद अहल-ए-हिंद के ख़याल, एहसास और ज़िंदगी में एक गहरी वहदत मौजूद है जो तरक़्क़ी के दौर में ज़्यादा और तनज़्ज़ुल के दौर में कम होती रहती है। अमीर ख़ुसरो 653 हिज्री में ब-मक़ाम-ए-पटियाली पैदा हुए और… continue reading

अमीर ख़ुसरो की सूफ़ियाना शाइ’री-डॉक्टर सफ़्दर अ’ली बेग

सूफ़ियों के अ’क़ीदे में ख़ुदा की ज़ात ही सबसे अहम-तरीन है। जिसके तसव्वुर में इन्सान मुस्तग़रक़ हो जाए उनका कहना है कि ये इन्सानी अ’क़्ल के बस से बाहर है कि वो ख़ुदा को समझ सके और उसकी ता’रीफ़-ओ-तमजीद कर सके।दिमाग़-ए-इन्सानी ज़मान-ओ-मकान में महदूद है इसलिए जो शय ज़मान-ओ-मकान के हुदूद से मावरा हो, उस… continue reading

अमीर ख़ुसरो और इन्सान-दोस्ती-डॉक्टर ज़हीर अहमद सिद्दीक़ी

आज जिस मौज़ूअ’ पर दा’वत-ए-फ़िक्र दी गई है वो “अमीर ख़ुसरो और इन्सान-दोस्ती का मौज़ूअ’ है । देखना ये है कि हज़रत अमीर ख़ुसरो ने ज़िंदगी की इस रंगा-रंगी को किस नज़र से देखा है और इसको किस तरह बरता है । इन्सान-दोस्ती का वो कौन सा नसबुल-ऐ’न है जो अमीर ख़ुसरो के सिल्सिला से… continue reading

अमीर ख़ुसरो बुज़ुर्ग और दरवेश की हैसियत से-मौलाना अ’ब्दुल माजिद दरियाबादी

ख़ालिक़-बारी का नाम भी आज के लड़कों ने न सुना होगा। कल के बूढ़ों के दिल से कोई पूछे किताब की किताब अज़-बर थी।ज़्यादा नहीं पुश्त दो पुश्त उधर की बात है कि किताब थी मकतबों में चली हुई, घरों में फैली हुई, ज़बानों पर चढ़ी हुई| गोया अपने ज़माना-ए-तस्नीफ़ से सदियों तक मक़्बूल-ओ-ज़िंदा, मश्हूर-ओ-ताबिंदा।… continue reading

हज़रत बख़्तियार काकी रहमतुल्लाहि अ’लैह-मोहम्मद अल-वाहिदी

ज़िंदः-ए-जावेदाँ ज़े-फ़ैज़-ए-अ’मीमकुश्तः-ए-ज़ख़्म-ए-ख़ंजर-ए-तस्लीम आपका पूरा नाम ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी है। सरज़मीन-ए-अद्श में (जो मावराऊन्नहर के इ’लाक़ा में वाक़े’ है) पैदा हुए थे। आपकी निस्बत बहुत से ऐसे वाक़िआ’त बयान किए जाते हैं जिनसे मा’लूम होता है कि आपकी विलायत का सिक्का आपकी विलादत-ए-बा-सआ’दत से पहले ही बैठना शुरूअ’ हो गया था। लेकिन अफ़्सोस है अ’जीब-ओ-ग़रीब… continue reading

मंसूर हल्लाज

हज़रत हुसैन बिन मंसूर हल्लाज की शहादत का क़िस्सा लिखने से पहले ये बता देना ज़रूरी है कि आपका फ़साना इस क़दर पेचीदा और पुर-असरार है कि इस मुख़्तसर बयान में समाता मा’लूम नहीं होता। शोर-ए-मंसूर अज़ कुजा-ओ-दार-ए-मंसूर अज़ कुजा। ख़ुद ज़दी बांग-ए-अनल-हक़  बर सर-ए-दार आमदी।। ये कुछ ईरान-ओ-अ’रबिस्तान ही में नहीं बल्कि अक्सर मुल्कों… continue reading

बाबा फ़रीद शकर गंज

(पाल माल गज़ट लंदन से तर्जुमा ) पाक पट्टन शरीफ़ दुनिया-ए-तवारीख़ को अजोधन के नाम से तेईस सौ साल से मा’लूम है लेकिन उसका दूसरा नाम पाक पट्टन शरीफ़ आज से आठ सौ साल क़ब्ल उसे मिला था। उस वक़्त से ये अपने क़िला’ की मज़बूती के लिए नहीं बल्कि एक मुक़द्दस हस्ती की जा-ए-आराम… continue reading

हज़रत शैख़ जमालुद्दीन कोल्हवी

(मुहिब्ब-ए-मोह्तरम मौलाना-ओ-हकीम सय्यिद नासिर नज़ीर साहिब फ़िराक़ देहलवी के एक ख़त का ख़ुलासा) वुफ़ूर-ए-रहमत-ए-बारी ने मय-ख़्वारों पर उन रोज़ोंजिधर से अब्र उठता है सू-ए-मय-ख़ाना आता है साढे़ तीन महीना में इ’लाज के मदारिज तय हो लिए और नाज़िरुद्दीन अहमद ख़ान साहिब का मिज़ाज ए’तिदाल पर आ गया और उन्होंने दिल्ली जाने की इजाज़त दे दी।… continue reading

सुलूक-ए-नक़्शबंदिया-नासिर नज़ीर फ़िराक़ चिश्ती देहलवी

सिल्सिला-ए-आ’लिया नक़्शबंदिया की इस्तिलाहों की शर्ह में मुतक़द्दिमीन-ओ-मुतअख़्ख़िरीन सूफ़िया रहिमहुमुल्लाह ने दफ़्तर के दफ़्तर सियाह कर डाले हैं। हज़ारों रिसाले और सैंकड़ों किताबें दिखाई देती हैं मगर हज़रत उ’र्वतुल-उस्क़ा ख़्वाजा मोहम्मद मा’सूम ने जो हज़रत मुजद्दिद-अल्फ़-ए-सानी रज़ीयल्लाहु अ’न्हु के फ़र्ज़ंद हैं इस बारे में कमाल किया है। या’नी एक मुरीद के पूछने पर एक छोटे… continue reading

संत साहित्य-श्री परशुराम चतुर्वेदी

कुछ दिनों पूर्व तक संतों का साहित्य प्रायः नीरस बानियों एवं पदों का एक अनुपयोगी संग्रह मात्र समझा जाता था और सर्व साधारण की दृष्टि में इसे हिंदी-साहित्य में कोई विशिष्ट पद पाने का अधिकार नहीं था। किंतु संत साहित्य को विचार-पूर्वक अध्ययन एवं अनुशीलन करने पर यह बात एक प्रकार से नितांत निराधार सिद्ध… continue reading