Articles By Sufinama Archive

Sufinama Archive is an initiative to reproduce old and rare published articles from different magazines specially on Bhakti movement and Sufism.

मसनवी की कहानियाँ -4

लोगों का अँधेरी रात में हाथी की शनाख़्त पर इख़्तिलाफ़ करना ऐ तह देखने वाले, काफ़िर-ओ-मोमिन-ओ-बुत-परस्त का फ़र्क़ अलग अलग पहलू से नज़र डालने के बाइ’स ही तो है। किसी ग़ैर मुल्क में अहल-ए-हिंद एक हाथी दिखाने लाए और उसे बिलकुल तारीक मकान में बांध दिया। लोग बारी बारी से आते और उस अंधेरे घर… continue reading

गीता और तसव्वुफ़-मुंशी मंज़ूरुल-हक़ कलीम

हिन्दुस्तान जिस तरह तमद्दुन-ओ-मुआ’शरत में दूसरी मोहज़्ज़ब क़ौमों का गुरू था उसी तरह वो रूहानियत में भी कमाल पर पहुंचा हुआ था।श्री कृष्ण जी की गीता उस ज़र्रीं अ’ह्द की बेहतरीन याद-गार है। गीता महा-भारत मुसन्निफ़ा वेद व्यास के भीष्म पर्व का जुज़्व है।उस में अठारह बाब और सात सौ मंत्र हैं जिनमें वो उसूल-ओ-नसीहतें… continue reading

उ’र्फ़ी हिन्दी ज़बान में-मक़्बूल हुसैन अहमदपुरी

दूसरे मशाहीर-ए-अ’हद-ए-मुग़लिया की तरह उ’र्फ़ी भी संस्कृत या हिन्दी ज़बान न जानता था।लेकिन हिंदूओं के रस्म-ओ-रिवाज और उनके अ’क़ाइद के मुतअ’ल्लिक़ आ’म बातों से वाक़िफ़ था।चुनाँचे उसने अपने अश्आ’र में जा-ब-जा अहल-ए-हिंद के रुसूम की तरफ़ इशारा किया है।और ये दिल-फ़रेब किनाए ज़्यादा-तर उसके ग़ज़लियात के मज्मूआ’ में पाए जाते हैं। ब-हैसियत-ए-इन्सान उ’र्फ़ी की हक़ीक़ी… continue reading

मसनवी की कहानियाँ -3

एक सूफ़ी का अपना ख़च्चर ख़ादिम-ए-ख़ानक़ाह के हवाले करना और ख़ुद बे-फ़िक्र हो जाना(दफ़्तर-ए-दोम) एक सूफ़ी सैर-ओ-सफ़र करता हुआ किसी ख़ानक़ाह में रात के वक़्त उतर पड़ा। सवारी का ख़च्चर तो उसने अस्तबल में बाँधा और ख़ुद ख़ानक़ाह के अंदर मक़ाम-ए-सद्र में जा बैठा। अह्ल-ए-ख़ानक़ाह पर वज्द-ओ-तरब की कैफ़ियत तारी हुई फिर वो मेहमान के… continue reading

मसनवी की कहानियाँ -2

एक गँवार का अंधेरे में शेर को खुजाना (दफ़्तर-ए-दोम) एक गँवार ने गाय तबेले में बाँधी। शेर आया और गाय को खा कर वहीं बैठ गया। वो गँवार रात के अंधेरे में अपनी गाय को टटोलता हुआ तबेले पहुंचा और अपने ख़याल में गाय को बैठा पाकर शेर के हाथ पैर पर, कभी पीठ और… continue reading

फ़िरदौसी-अज़ सय्यद रज़ा क़ासिमी साहिब हुसैनाबादी

ताज़ा ख़्वाही दाश्तन गर दाग़-हा-ए-सीनः रा गाहे-गाहे बाज़ ख़्वाँ ईं क़िस्सा-ए-पारीनः रा अबुल-क़ासिम मंसूर, सूबा-ए-ख़ुरासान के इब्तिदाई दारुस्सुल्तनत तूस में सन 935 ई’स्वी में पैदा हुआ था। उसके बाप का नाम इस्हाक़ बिन शरफ़ था जो सूबा-दार-ए-तूस मुसम्मा अ’मीद की एक जाएदाद का मुहाफ़िज़ था। उस मिल्कियत का नाम फ़िरदौस था।इसी रिआ’यत से अबुल-क़ासिम ने अपना तख़ल्लुस फ़िरदौसी… continue reading

मसनवी की कहानियाँ -1

एक ख़रगोश का शेर को चालाकी से हलाक करना (दफ़्तर-ए-अव्वल) कलीला-ओ-दिमना से इस क़िस्से को पढ़ इस में से अपने हिस्से की नसीहत हासिल कर। कलीला-ओ-दिमना में जो कुछ तूने पढ़ा वो महज़ छिलका और अफ़्साना है इस का मग़्ज़ अब हम पेश करते हैं। एक सब्ज़ा-ज़ार में चरिन्दों की शेर से हमेशा कश्मकश रहती… continue reading

उ’र्स-ए-बिहार शरीफ़

पाँचवें शव्वाल को हम लोग ब-तक़रीब-ए-उ’र्स हज़रत बुर्हानुल-आ’रिफ़ीन मख़्दूम-ए-जहाँ शैख़ शरफ़ुद्दीन अहमद यहया अल-मनेरी अल-बिहारी, बिहार हाज़िर हुए।उ’र्स बि-हम्दिल्लाह ख़ैर-ओ-ख़ूबी से तमाम हुआ। इस साल मेला का भारी जमाव था। मजमा’ बहुत ज़्यादा था। अतराफ़-ओ-जवार के अ’लावा ज़िला’ पूर्निय-ओ-भागलपूर,दरभंगा-ओ-ज़िला मुंगेर-ओ-ज़िला सारन वग़ैरा वग़ैरा दूर-दराज़ मक़ामात के लोग अ’वाम-ओ-अ’माइद-ओ-मोअ’ज़्ज़ेज़ीन हाज़िर थे।आज़ाद फ़ुक़रा का बड़ा गिरोह और… continue reading

शम्स तबरेज़ी-ज़ियाउद्दीन अहमद ख़ां बर्नी

आपका असली नाम शम्सुद्दीन है।आपके वालिद-ए-माजिद जनाब अ’लाउद्दीन फिर्क़ा-ए-इस्माई’लिया के इमाम थे।लेकिन आपने अपना आबाई मज़हब तर्क कर दिया था।आप तबरेज़ में पैदा हुए और वहीं उ’लूम-ए-ज़ाहिरी की तहसील की।आप अपने बचपन का हाल ख़ुद बयान फ़रमाते हैं कि उस वक़्त मैं इ’श्क़-ए-रसूल सल्लल्लाहु अ’लैहि व-सल्लम में इस क़दर मह्व था कि कई कई रोज़… continue reading

तसव़्वुफ का अ’सरी मफ़्हूम-डॉक्टर मस्ऊ’द अनवर अ’लवी काकोरी

तसव्वुफ़ न कोई फ़ल्सफ़ा है न साइंस। ये न कोई मफ़रूज़ा है न हिकायत और न ख़्वाब कि जिसकी ता’बीरें और मफ़्हूम ज़मानों के साथ तग़य्युर-पज़ीर होते हों।यह एक हक़ीक़त है।एक न-क़ाबिल-ए-तरदीद हक़ीक़त।एक तर्ज़-ए-हयात है।एक मुकम्मल दस्तूर-ए-ज़िंदगी है जिसको अपना कर आदमी इन्सानियत की क़बा-ए-ज़र-अफ़्शाँ ज़ेब-तन करता है।तो आईए सबसे पहले ये देखा जाए कि इसका असली… continue reading