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हज़रत शरफ़ुद्दीन अहमद मनेरी रहमतुल्लाह अ’लैह

ज़िक्र से मुराद ख़ुदा-वंद तआ’ला की याद है। इसकी चार क़िस्में हैं: 1 ज़बान पर हो लेकिन दिल में न हो, 2 ज़बान और दिल दोनों में हो, मगर दिल किसी वक़्त उससे ग़ाफ़िल हो जाता हो, लेकिन ज़बान पर जारी हो, 3 ज़बान और दिल में बराबर हो, 4 दिल में हो और ज़बान ख़ामोश हो।

एकता का महत्व

हज़रत वारिस पाक ने फ़रमाया-
1- जो हमसे मोहब्बत करता है वो हमारा है।
2- हमारे हाँ मजूसी, ई’साई वग़ैरा सब मज़हब वाले बराबर हैं कोई बुरा नहीं।
3- हमारे हाँ तो मोहब्बत ही मोहब्बत है।

फ़तेहपुर सीकरी के रुहानी सुल्तान हज़रत शैख़ सलीम चिश्ती

दरवेशों की हड्डियों में इ’श्क़-ए-इलाही के सबब बे-शुमार सुराख़ होते हैं।

क़व्वाली और अमीर ख़ुसरो – अहमद हुसैन ख़ान

एक सौत-ए-सर्मदी है जिस का इतना जोश है।

वर्ना हर ज़र्रा अज़ल से ता-अबद ख़ामोश है।।

जिन नैनन में पी बसे दूजा कौन समाय

यह प्रेम की डोर ही जीवन है. इस से बंध कर ही आत्मा की पतंग उड़ती है. कभी कभी ऐसा भ्रम होता है कि यह डोर न होती तो शायद पतंग और ऊँचे जाती परन्तु जैसे ही यह डोर टूटती है पतंग सीधी ज़मीन पर आ गिरती है.

हज़रत ख़्वाजा सैयद नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी

ख़्वाजा-ए-ख़्वाजगान हज़रत ख़्वाजा सैयद नसीरुद्दीन महमूद रौशन चिराग़ देहलवी सिलसिला-ए-चिश्तिया के रौशन चराग़ हैं। हज़रत की पैदाइश अयोध्या में 675 हिज्री (1276/77 ई’स्वी) में हुई थी।आपके वालिद माजिद का नाम हज़रत सैयद अल-मुई’द यहया युसूफ़ अल-गिलानी था। आपके दादा का नाम सैयद अबू नस्र अ’ब्दुल लतीफ़ रशीदुद्दीन अल-गिलानी था जो यमन, ख़ुरासान, नेशापुर, लाहौर, दिल्ली… continue reading