हज़रत ख़्वाजा मुई’नुद्दीन चिश्ती की दरगाह- प्रोफ़ेसर निसार अहमद फ़ारूक़ी

 तारीख़ की बा’ज़ अदाऐं अ’क़्ल और मंतिक़ की गिरफ़्त में भी नहीं आतीं। रू-ए-ज़मीन पर ऐसे हादसात भी गुज़र गए हैं जिनसे आसमान तक काँप उठा है मगर तारीख़ के हाफ़िज़े ने उन्हें महफ़ूज़ करने की ज़रूरत नहीं समझी और एक ब-ज़ाहिर बहुत मा’मूली इन्फ़िरादी अ’मल-ए-जावेदाँ बन गया है और उसके असरात सदियों पर फैल… continue reading

शम्स तबरेज़ी-ज़ियाउद्दीन अहमद ख़ां बर्नी

आपका असली नाम शम्सुद्दीन है।आपके वालिद-ए-माजिद जनाब अ’लाउद्दीन फिर्क़ा-ए-इस्माई’लिया के इमाम थे।लेकिन आपने अपना आबाई मज़हब तर्क कर दिया था।आप तबरेज़ में पैदा हुए और वहीं उ’लूम-ए-ज़ाहिरी की तहसील की।आप अपने बचपन का हाल ख़ुद बयान फ़रमाते हैं कि उस वक़्त मैं इ’श्क़-ए-रसूल सल्लल्लाहु अ’लैहि व-सल्लम में इस क़दर मह्व था कि कई कई रोज़… continue reading

तसव़्वुफ का अ’सरी मफ़्हूम-डॉक्टर मस्ऊ’द अनवर अ’लवी काकोरी

तसव्वुफ़ न कोई फ़ल्सफ़ा है न साइंस। ये न कोई मफ़रूज़ा है न हिकायत और न ख़्वाब कि जिसकी ता’बीरें और मफ़्हूम ज़मानों के साथ तग़य्युर-पज़ीर होते हों।यह एक हक़ीक़त है।एक न-क़ाबिल-ए-तरदीद हक़ीक़त।एक तर्ज़-ए-हयात है।एक मुकम्मल दस्तूर-ए-ज़िंदगी है जिसको अपना कर आदमी इन्सानियत की क़बा-ए-ज़र-अफ़्शाँ ज़ेब-तन करता है।तो आईए सबसे पहले ये देखा जाए कि इसका असली… continue reading

सुल्तानुल-मशाइख़ और उनकी ता’लीमात-हज़रत मोहम्मद आयतुल्लाह जा’फ़री फुलवारवी

सुल्तानुल-मशाइख़ की शख़्सियत पर अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है इसलिए उनकी शख़्सियत के किसी नए गोशे का इन्किशाफ़ मुश्किल है।सीरत-ओ-शख़्सियत के किसी नए पहलु तक मुहक़्क़िक़ीन और अहल-ए-क़लम ही की रसाई हो सकती है।ख़ाकसार इसका अहल नहीं।ये चंद सतरें सुल्तानुल-मशाइख़ महबूब-ए-इलाही हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, क़ुद्दिसा सिर्रहु से अ’क़ीदत-ओ-मोहब्बत के नतीजे में और सिलसिला-ए-चिश्तिया… continue reading

हकीम सफ़दर अ’ली ‘सफ़ा’ वारसी : साहिब-ए-जल्वा-ए-वारिस

हिन्द-ओ-नेपाल सरहद पर आबाद एक छोटा सा ज़िला’ बहराइच इ’लाक़ा-ए-अवध का एक तारीख़ी इ’लाक़ा है जिसे सुल्तानुश्शोह्दा फ़िल-हिंद हज़रत सय्यिद सालार मस्ऊ’द ग़ाज़ी (रहि.) की जा-ए-शहादत होने का शरफ़ हासिल है।बहराइच ज़माना-ए-क़दीम से इ’ल्म का मरकज़ रहा है।दरिया-ए-घाघरा के किनारे सूबा-ए-उत्तर प्रदेश के दारुल-हुकूमत लखनऊ से 125 किलो मीटर के फ़ासला पर वाक़े’ बहराइच सूबा-ओ-ख़ित्ता-ए-अवध… continue reading

ज़ियाउद्दीन बर्नी की ज़बानी हज़रत महबूब-ए-इलाही का हाल- ख़्वाजा हसन सानी निज़ामी

शैख़ुल-इस्लाम निज़ामुद्दीन (रहि.)ने बैअ’त-ए-आ’म का दरवाज़ा खोल रखा था। गुनहगार लोग उनके सामने अपने गुनाहों का इक़्बाल करते और उनसे तौबा करते और वो उनको अपने हल्क़ा-ए-इरादत में शामिल कर लेते। ख़्वास-ओ-अ’वाम, मालदार-ओ-मुफ़्लिस, अमीर-ओ-फ़क़ीर, आ’लिम-ओ-जाहिल, शरीफ़-ओ-रज़ील, शहरी-ओ-दहक़ानी,ग़ाज़ी-ओ-मुजाहिद, आज़ाद-ओ-ग़ुलाम, उन सबसे वो तौबा कराते और उनको ताक़िया और मिस्वाक सफ़ाई के लिए देते। उन लोगों में से कसीर ता’दाद (जमाहीर) जो ख़ुद को… continue reading