आज रंग है !

रंगों से हिंदुस्तान का पुराना रिश्ता रहा है. मुख़्तलिफ़ रंग हिंदुस्तानी संस्कृति की चाशनी में घुलकर जब आपसी सद्भाव की आंच पर पकते हैं तब जाकर पक्के होते हैं और इनमें जान आती है. यह रंग फिर ख़ुद रंगरेज़ बन जाते हैं और सबके दिलों को रंगने निकल पड़ते हैं. होली इन्हीं ज़िंदा रंगों का त्यौहार है.

त्यौहारों का सिर्फ़ सांस्कृतिक महत्व ही नहीं होता अपितु इनके पीछे सैकड़ों कहानियाँ और अनुभव जुड़े होते हैं. ठीक उसी तरह जैसे कोई व्यक्ति किसी नदी में नहा रहा हो और तभी उसे मा’लूम पड़े कि यह नदी गंगा है. यह सुनते ही उसके मानस पर धर्म, मिथक और सदियों से चली आ रही कहावतें रक़्स करने लगती हैं. ये त्यौहार हमारी संस्कृति को एक धागे में पिरोते हैं, जिस धागे से बंध कर हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की पतंग आसमान की बुलंदी को छूती है. कभी कभी यह भी लगता है कि अगर यह डोर न होती तो पतंग और ऊँचे जाती लेकिन जैसे ही यह डोर टूटती है पतंग सीधी ज़मीन पर आ गिरती है.

होली का त्यौहार हिंदुस्तान में सदियों से मनाया जाता रहा है. होली, फागुन, फाग, फगुआ, आब-पाशी, ईद-ए-ग़ुलाबी  न जाने कितने नामों से इसे जाना जाता रहा. धम्मपद में एक कथा है कि एक बार बुद्ध एक नगर के समीप पहुंचे. नगर के बुज़ुर्गों ने उनका स्वागत किया और आग्रह किया कि वह यहीं नगर के बाहिर  एक बाग़ में ठहर जाएँ. आज कल हर वर्ष ६-७ दिनों के लिए नगर के युवा उन्मत्त से हो जाते हैं. यहाँ होली या फाग का नाम नहीं आया है पर यह विवरण उसी उत्सव की ओर संकेत करता प्रतीत होता है. ‘मीमांसा-दर्शन’ में तो होलिका नाम का एक अलग अधिकरण ही है. इसमें यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया है कि होलिका भी वेद से असम्मत नहीं है.

संस्कृत में ‘फल’ एक धातु है जो निष्पति (फलना, सफल होना ), परिणाम निकालना और पकना आदि अर्थों में प्रयुक्त होती है. पाणिनि के ‘फलि पाटिनमि मनि जनां गुक पटि नाधिधनश्च’ सूत्र के फल + गुक – फल्गु शब्द बनता है. यही फल्गु कालांतर में रूपांतरित होता हुआ फल्गु-फग्गु-फागु-फाग बन गया. संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ में फल्गु शब्द के कई अर्थ दिए गए हैं—आसार, अल्प, गया की एक नदी, उत्सव, होली का त्यौहार और वसंतोत्सव.

यह स्वाभाविक था कि इस मधुमयी ऋतु का सम्बन्ध आनंद और उल्लास से प्रतीक कामदेव से जोड़ा जाता. यही हुआ भी. फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी के दिन मदनोत्सव मनाया जाने लगा यानी बसंत के आरम्भ में काम देव को याद किया जाता था.

होली का यह जो वर्तमान रूप दिखाई देता है वह हज़ारों वर्ष पुराना है. भारत के पूर्वी भाग में जो अनेक प्रकार की उद्यान क्रीड़ाएँ प्राचीन काल से चली आ रही थी वह होली की ही सहेलियां थीं. काशिका में इन क्रीड़ाओं के निम्न उदाहरण दिए गए हैं :

उद्दालक पुष्प भंजिका, वीरण पुष्प प्रचायिका, शाल भंजिका और अभ्योष खादिका (दाल आदि का भोजन).

वात्स्यायन मुनि ने इन्हें देश परंपरागत क्रीड़ाएं कहा है तथा इनके कुछ और नाम भी दिए हैं  जैसे—सहकार भंजिका, पुष्प वचायिका, विसभक्षिका (कमल तंतु का भक्षण ) दमन भंजिका (संयम तोड़ना ) उदक्ष्वेडिका (पानी डालना)

संस्कृत के महाकवियों और नाटककारों ने इस पर्व के अंतर्गत जिन उत्सवों की चर्चा की है, वह मूलतः छह हैं :

(१.नवान्नेष्टि (२.अशोकोन्तसिका (३. पुष्प प्रचायिका (४. वसंतोत्सव या मदनोत्सव (५. होलिकोत्सव (६. उदक्ष्वेडिका

इन सारे उत्सवों के साथ यह पर्व माघ शुक्ल पंचमी (वसंत पंचमी ) से चैत्र पूर्णिमा तक लगभव ढाई महीने तक मनाया जाता रहा है.

१. नवान्नेष्टि

होली के दिन अग्निहोत्री ब्राह्मण यवाग्रयण नामक यज्ञ करते थे. आज भी कहीं कहीं होली की अग्नि में गेहूं या जौ की बालें भून कर उन्हें प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की प्रथा है. रंगों में नहाना शायद यज्ञ के बा’द स्नान की विधा रही हो.

२. अशोकोन्तसिका

सुन्दर स्त्रियों के पदाघात से अशोक का तथा उन्हीं की मुख मदिरा के सिंचन से वकुल का खिलना संस्कृत साहित्य में ग्रहण किया गया है.

३. पुष्प प्रचायिका

काम पूजा के लिए फूलों का चयन ही पुष्प प्रचायिका है. इसमें विशेषता यह थी कि हाथ में आयी हुई डाली से फूल ख़ुद चुनने पड़ते थे. इस क्रीड़ा से सम्बंधित एक मार्मिक ग्राम गीत मिलता है. एक गर्भिणी स्त्री अपने गर्भस्त बालक को सम्बोधित करते हुए कह रही है कि बेटा! तुम चैत्र में मत पैदा होना. सब सखियाँ जब फूल चुनने जाएंगी तब मैं कैसे जाऊँगी!

ये रतनारे होरिलवा! चैत जिनि जनमेउ

सब सखि चुनिहैं कुसुमियाँ चुनन कैसे जाबइ

४. वसंतोत्सव

वसंत उत्सव में आम्र मंजरी से कामदेव की अर्चना की जाती थी. कालिदास ने अपने अभिज्ञान शाकुंतलम नाटक में इसकी ख़ूब चर्चा की है.

५. होलिकोत्सव

होली के उत्सव का वर्णन भविष्योत्तर पुराण में आता है जिसका भावानुवाद यूँ है :

राजन! शीतकाल का अंत है. इस फाल्गुनी पूर्णिमा के पश्चात प्रातः मधुमास होगा.आप सभी को अभय दीजिये जिस से वह निर्भीक हो कर हंसे, खेले. प्रसन्न बालक लकड़ी की तलवारें लेकर अपने बंधुओं से लड़ने के लिए निकल पड़ें. रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर, चन्दन अ’बीर और गुलाल लगाकर ,पान चबाते हुए, एक दूसरे पर रंग डालने के लिए बांस या चमड़े की पिचकारियां लेकर निकलें. एक दूसरे को गालियां देकर हंसे, स्त्रियां नाचें. पुरुष सन्यासी नट तथा योगियों का तथा स्त्रियां वैश्याओं, योगिनियों तथा मोहिनी का स्वांग रचें.जिनके मन में जो आये सो कहे. ऐसे शब्दों से तथा हवन करने से यह पापिनी ढूँढा (होलिका ) नष्ट हो जाती है.

६. उदक्ष्वेडिका

पिचकारियों द्वारा जल प्रक्षेप ही उदक्ष्वेडिका है. यह नवान्नेष्टि यज्ञ के स्नान का स्मृति शेष ही मालूम पड़ती है. युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की समाप्ति पर यज्ञान्त स्नान का जो वर्णन मिलता है वही इस रंगरोली की फाग का मूलाधार है.

गंध, माला, भूषण तथा वस्त्रों से अलंकृत पुरुष एवं स्त्रियां गंगा में स्नान के लिए गयीं. वहां वे तेल , गोरस, सुगन्धित जल, हल्दी और गहरे रंग की कुमकुम आदि से एक दूसरे को रंगने लगीं. वे चमड़े के यंत्रों से अपने देवरों और प्रियजनों को भिगो रही थीं.

ये चमड़े के यन्त्र ही पिचकारियों के जनक हैं.

होली के त्यौहार को भक्त  प्रह्लाद, हिरण्य कश्यपु और होलिका की कहानी से भी जोड़ा जाता है जिसमे अन्य कहानियों की तरह ही असत्य पर सत्य की विजय होती है. लेकिन होली का एक आध्यात्मिक स्वरुप सूफ़ियों और संतों के यहाँ भी मिलता है, जहाँ अपने आप को फ़ना करके अपने ऊपर मुर्शिद या गुरु का रंग चढ़ाना और दुई का भेद ख़त्म होने का जश्न मनाया जाता है.

सूफ़ियों और संतों के काव्य और उपदेश इस रंग में डूबे हुए हैं. यहाँ  होली  ख़ुदी के मिट जाने का उत्सव है और परमात्मा के मिलन का नृत्य. तभी हज़रत अमीर ख़ुसरो इस रंग को महा रंग कहते है :

आज रंग है री महा रंग है

मेरे महबूब के घर रंग है री.

मोहे पीर पायो निज़ामुद्दीन औलिया

जहाँ देखूं मोरे संग है री.

हज़रत अमीर ख़ुसरो ने हिन्दुस्तानी संस्कृति का रंग ओ गुलाल अपने कलाम में जम कर उड़ाया है. अमीर ख़ुसरो ने हिन्दुस्तानी संस्कृति और इस के आब-ओ-हवा पर बहुत कुछ लिखा है. हज़रत अमीर ख़ुसरो ने सुफ़ियों को पहले पहल रंग दिया और हिन्दुस्तानी तहज़ीब ने इस रंग को रंगरेज़ बना दिया. यह रंग उनके बा’द के तमाम सूफ़ियों और संतों के कलाम में रक़्स करता नज़र आता है. ख़ुसरो के तुरंत बाद ही विद्यापति ने प्रेम रस और शृंगार रस को अपनी कविताओं में घोलकर घर-घर पहुँचाया. अमीर ख़ुसरो के यहाँ हिन्दू संस्कृति के प्रति जो उत्सुकता दिखती है, वही उत्सुकता विद्यापति की कीर्तिलता में इस्लामी संस्कृति के प्रति दिख जाती है. अब हिन्दू और मुस्लमान दोनों पर धीरे-धीरे एक दूसरे का रंग चढ़ने लगा था और एक गंगा-जमुनी तहज़ीब का रंग तैयार होने लगा था.  राजनितिक उथल-पुथल से भरे इस दौर में भी सूफ़ियों और संतों ने अपना यह रंग जमकर लुटाया. कबीर ने तो हद और अनहद दोनों रंग दिए. जब यह रंग चला तो कबीर के पदों में भी पहुंचा :

गगन मँडल बिच होरी मची है, कोइ गुरू गम तें लखि पाई

सबद डोर जहँ अगर ढरतु है, सोभा बरनि न जाई

फगुवा नाम दियो मोहिं सतगुरू, तन की तपन बुझाई

कहै कबीर मगन भइ बिरहिनि, आवागवन नसाई

होली खेलते-खेलते कबीर ख़ुद फगुवा बन गए. जब बे-ख़ुदी का यह आ’लम हो तो होरी का यह रंग आ’म लोगों पर कैसे न चढ़ता. रंगों का यह सफ़र अनोखा होता है , एक बार चढ़ गया, पक्का हो गया तो उतारे नहीं उतरता.

नया रंग समाज बर्दाश्त नहीं करता. कबीर को भी बर्दाश्त नहीं किया गया. कबीर को ख़त्म कर के लोगों  ने सोचा उन्होंने रंग को ख़त्म कर दिया पर रंग तो अपने सफ़र पर कब का निकल चुका था. आगे यही रंग बुल्लेह शाह की काफ़ियों में मिलता है :

होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

नाम नबी की रतन चढ़ी, बूँद पड़ी इल्लल्लाह

रंग रंगीली उही खिलावे, जो सखी होवे फ़ना फ़ील्लाह

होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह.

ख़ुदा के रंग में रंग कर और दूजा रंग कहाँ बचता है. काशी में कबीर और कसूर में बुल्लेह शाह, रंग का यह सफ़र अविरल अविराम था. बुल्लेह शाह से पहले यह रंग मीरा के पदों में दिखता है. मीरा अपने रंगों में अविनाशी तत्त्व मिला कर सब रंगों को पक्का कर देती हैं. सब कुछ सहज हो जाता है :

सहज मिले अविनाशी रे !

मीरा के अविनाशी होरी में साकार रूप धर कर फाग खेलते हैं. दिल ही ब्रज हो जाता है और दिल ही काशी. मीरा प्रभू के रंग में रंगी जब उचारती हैं तो रंग ही रंग झरते हैं. बृन्दावन भी लाल हो जाता है :

झूलत राधा संग , गिरिधर झूलत राधा संग

अबीर गुलाल की धूम मचाई, डारत पिचकारी रंग

लाल भयो बृन्दावन जमना, केसर चुवत अनंग

मीरा के प्रभु गिरधर नागर , चरण कमल बहे गंग.

मीरा रंगों के ही माध्यम से जीवात्मा को सचेत भी करती हैं. हृदय में इश्क़ का रंग तब तक नहीं चढ़ता जब तक अनहद नाद सुनाई नहीं पड़ता :

फागुन  के दिन चार रे , होली खेल मना रे

बिन करताल पखावज बाजे , अनहद की झंकार रे!

बिन सुर राग छतीसूं गावे, रोम रोम रण कार रे

सील संतोख की केसर घोली, प्रेम प्रीत पिचकार रे!

होली का वर्णन सूफ़ियों और संतों की वाणियों में वास्तव में जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का उत्सव है. जब जीवात्मा अपने भीतर परमात्मा का अनुभव कर लेती हैं तब हर पल उसके लिए महा रंग हो जाता है.

शाह तुराब अ’ली क़लन्दर ने होरी के पदों में अपने उसी अविनाशी महबूब की चिरौरी की है. ठांव कुठाँव में उसी को देखा है. वही अविनाशी आत्मा के साथ होरी खेल रहा है. जहाँ सारे रंग आकर मिल जाते हैं और रंगों के इस महा मिलन से आत्मा कुंदन होकर निकलती है :

सोही चूनरया रंग दे मोका।

ओ रंगरेज रंगीले यार।।

सोही पगड़िया लाल पिया की।

सोही रंगत पर मैं बलिहार ।।

सब रंग फीके ‘तुराब’ के आगे।

जोगिया रंग की औरे बहार।।

शाह तुराब रंग की पिचकारी लेकर ढूँढने वाले मुर्शिद को कह रहे हैं मैं तो तेरे ही रंग में रंग चुका हूँ , मैं सरापा तू  हो चुका हूँ. मुझे ढूंढ़ना अब तेरे लिए मुमकिन नहीं.

अब की होरी का रंग न पूछो

धूम मची है बिंदराबन मा

श्याम-बिहारी चतुर खिलारी

खेल रहा होरी सखियन मा

हाथ लिये पिचकारी फिरत है

अबीर गुलाल भरे दावन मा

कैसे सखी कोउ निकसे मंदिर सो

ठाड़ो है डीठ लंगर आँगन मा

मो का कहाँ वह ढूँढे पावै

मैं तो छुपी हूँ ‘तुराब’ के मन मा

हज़रत शाह नियाज़ बरेलवी ने भी अपने हिन्दवी कलाम में होरी पर गीत लिखे हैं. सूफ़ियाना रंग में रंगी उनकी लेखनी हमें तसव्वुफ़ के गहरे रंगों से सराबोर कर देती है :

होरी होय रही अहमद जियो के द्वार

नबी अ’ली को रंग बनो है हसन हुसैन खिलार

ऐसो अनोखो चतुर खिलाड़ी रंग दीनो संसार

‘नियाज़’ प्यारा भर भर छिड़के एक ही रंग पिचकार

मुग़ल काल में होली का स्वरूप काफ़ी विस्तृत हो गया था. मज़हबी त्यौहार से ऊपर उठकर होली आपसी सद्भाव का एक प्रतीक-पर्व बन चुकी थी. तानसेन ने अपने राग आधारित पदों में होली का वर्णन कुछ यूँ किया है :

चलौ तुमहू देखौ कैसी मची होरी, गावत रंग महल में नारी।

एक गावत एक मृदंग बजावत, एक नाँचत दै-दै तारी।।

अबीर-गुलाल-केसर पिचकारी तकि-तकि मारत, गावत हैं सब गारी।

‘तानसेन’ प्रभु खेल रच्यौ है, फगुवा लीन्हौ भारी।।

सूफ़ी प्रेमाख्यानक काव्य जब लिखे गए तब उनका ताना बाना भी हिन्दुस्तानी संस्कृति के धागे से ही बुना गया. सूफ़ी प्रेमाख्यानक महाकाव्य हमारी लोक संस्कृति और दर्शन का अनुपम दृश्य प्रस्तुत करते हैं. फाल्गुन महीने की पूर्णिमा को होली जलाना और दूसरे दिन उस जली हुई होली की राख उड़ाना तथा रंग और अबीर खेलना… इस पर्व के लोकाचार थे. साथ ही इस दिन ढोल-मंजीरे और झाल के साथ फाग और धमारी (झूमर) गाने और चाचरी नृत्य की भी प्रथा आम थी. सूफ़ी महाकाव्यों में और विशेष रूप से विरह वर्णन के बारह मासों में इस पर्व के कई रंग मिलते हैं.

‘पद्मावत’ में फाग खेलने, होली जलाने और झोली में राख लेकर उड़ाने की प्रथा का उल्लेख मिलता है :

फाग खेलि पुनि दाहब होली, सें तब खेह उड़ाउब झोली

नागमती के विरह-वर्णन में फाल्गुन महीने में सखियों के फाग खेलने, चाचरी नृत्य करने से उनके विरह का उत्ताप और बढ़ने का वर्णन मिलता है :

फाग करहि सब चाचरी जोड़ी, मोहि जिय लायि दिन्हि जस होरी

इसी प्रकार भाषा प्रेम रस में होली जलाने, फाग खेलने तथा रंग भरी पिचकारी छोड़ने का उल्लेख विरह वर्णन में मिलता है :

फागुन मोहि अगिनी अस जारा, जस होरी जरिकै भई छारा

नहि भावै मोहे फाग धमारी, आगि लगै देखत पिचकारी

चंदायन में होली के अवसर पर घर घर में उत्साह, तरुणियों के शृंगार और फाग के समय बजाये जाने वाले वाद्य यंत्रों की रसमय झंकार का वर्णन हुआ है :

घर घर रचहि दंदादर बारीं ,अति सुहाग यह राज दुलारीं

मुख तम्बोल चख काजर पूरहि, अंग भांग सिर चीर सिंदूरहिं

नाचहिं फाग होत झंकारा , तिहिं रस भयीं नयी संय सारा.

होली को शाहजहानी काल के दौरान ईद- ए- गुलाबी और आब-पाशी भी कहते थे. कहते हैं कि मुग़लिया हिंदुस्तान एक समय होली में अ’बीर ओ गुलाल से रंग जाया करता था. रंगों का यह जादू बादशाह-ए-वक़्त पर भी सर चढ़कर बोला. बादशाह बहादुरशाह ज़फर होली पर रंग और गुलाल लगवाते थे और उनका लिखा यह गीत प्रजा गाती थी :

क्यों मो पे मारी रंग की पिचकारी

देखो कुंवर जी दूंगी गारी !

इस ख़ास मौक़े  पर टेसू के फूलों को पीसकर पीला, ज़र्द  रंग तैयार किया जाता था और राजमहल में होली खेली जाती थी. इसके लिए शीशे और लकड़ी की पिचकारियाँ प्रयोग में लाई जाती थी.

मुग़ल बादशाह शाह आलम सानी ने होली के रंगों को अपनी अनोखी किताब ‘नादिरात-ए- शाही’ में संजोकर रखा है. यह किताब कई मा’नो में ख़ास है. शाह आलम ने अपनी यह किताब उर्दू के साथ साथ देवनागिरी लिपि में भी छपवाई. बादशाह के हुक्म पर यह किताब १७९७ में देवनागरी और उर्दू दोनों लिपियों में एक साथ लिखी गई थी.

ले पिचकारी चलाये लला ,तब चंचल चोट बचाए गयी है

अपनी नाक सूं खेलत है ,कहा चातुर नार खिलार नयी है

उचक आये सखियन को छोर के लाल गुलाल के मूठ दियी है

नीकी लगे यह आंखन में , कहा रंग अबीर सूं  होरी भई है.

उर्दू शाइरों  ने होली पर इतना लिखा है कि अगर सबको लिखना शुरू करें तो एक मुकम्मल किताब तरतीब दी जा सकती है. ख़ुदा-ए-सुख़न मीर तक़ी मीर के यहाँ होली पर दो मसनवियाँ मिलती हैं. नज़ीर अकबराबादी, हसरत मोहानी और उनके बा’द के शायरों ने होली पर जम कर शाइरी की. उर्दू शाइरी में होली पर जो कुछ लिखा गया है, उस पर काफ़ी लिखा जा चुका है. हम उस से इतर संतों-सूफ़ियों के कलाम में होली के विषय पर दोबारा लौट आते हैं.

अठारहवीं सदी में भक्ति आन्दोलन की एक लहर-सी चली जिस में कई निर्गुणी संत हुए जिनके कलाम सौभाग्य से उपलब्ध हैं. इनमे प्रमुख हैं—गुलाल साहेब, तुलसी साहेब (हाथरस वाले ), भीखा साहेब आदि जिनकी वाणियों में होली के पद भी मिलते हैं :

कोउ गगन में होरी खेलै

पाँच पचीसो सखियाँ गावहिं बानि दसौ दिसि मेलै

देत डंक अनुभव निस बासर झूमी झूमी गति डोलै

प्रेम लसित पिचुकारी छूटत तारी दै दै बोलै

तत्त बीर उड़त नभ छायो ज्ञानहीन मति तौलै

थकित भयो पग मग न परत ढिंग सुधि बिसरी गयो बोलै

अब की बार फाग दीजै प्रभु जान देवँ नहिं तौ लै

कहै ‘गुलाल’ कृपाल दयानिधि नाम दान दै गैलै

-गुलाल साहेब

मन में आनंद फाग उठो री

मन में आनंद फाग उठो री

इँगला पिंगला तारी देवै सुखमन गावत होरी

बाजत अणहद डंक तहाँ धुनि गगन में ताल परो री

सत-संगति चोवा अबीर करि दृष्टि रूप लै घोरी

गुरु गुलाल जी रंग चढ़ायो ‘भीखा’ नूर भरो री

-भीखा साहेब

होली का यह रंग इन सूफ़ियों-संतों के कलामों में हद-अनहद के बीच का सफ़र ख़ुदाई रंग में रंग कर झूमता गाता ख़ुद चलता  दिख जाता है.

बाराबंकी में स्थित देवा शरीफ़ का उल्लेख किए बिना हमारा यह लेख अधूरा है. देवा शरीफ़  में हज़रत वारिस-ए- पाक की दरगाह है. हज़रत के समय से ही यहाँ हर साल होली मनाई जाती है. यह हिंदुस्तान की एकमात्र ऐसी दरगाह है, जहाँ होली का पर्व मनाया जाता है. यहाँ का एक और क़िस्सा दिलचस्प है—हज़रत के विसाल के पश्चात यहाँ पर दो उर्स होते हैं, एक उर्स मुसलमान मनाते हैं जो हर साल सफ़र के महीने में होता है, वहीं हिन्दू  हर साल कार्तिक पूर्णिमा को हज़रत का उर्स मानते हैं. इस उर्स को करवाचौथ कहा जाता है.

हिंदुस्तान की मिट्टी अनूठी है. यहाँ सारी संस्कृतियाँ आपस में घुल-मिलकर एक ऐसा अनोखा रूप धर लेती हैं जिसपर अ’र्श वालों को भी रश्क होता है. तभी तो एक सूफ़ी शाइर कहता है :

रंग हो गुलाल हो

विसाल ही विसाल हो

यार संग मय पियें

यार ही हलाल हो!

रंगों का कोई मज़हब नहीं होता, न ही रंगों की कोई ज़ात होती है, पर जब यही रंग अपने सफ़र पर निकलते हैं तो इंसान के भीतर कुछ ज़िंदा हो उठता है. रंगों का यह सफ़र जितना ज़ाहिरी है, उससे कहीं ज़्यादा बातिनी है. ज़रूरत है कि रंगों के इस बातिनी सफ़र को रुकने न दिया जाए. होली का एक मतलब यह भी है जो हमें यह यक़ीन दिलाता है कि सारे चेहरे उसी ख़ुदा के रंग में रंगे हैं और वह रंग सबसे पक्का है.

  • Blog by – Suman Mishra

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