पैकर-ए-सब्र-ओ-रज़ा “सय्यद शाह मोहम्मद यूसुफ़ बल्ख़ी फ़िरदौसी”

बचपन ही से यूसुफ़ बल्ख़ी बहुत होनहार थे ।उनकी बड़ी बेटी क़मरुन्निसा बल्ख़ी फ़िरदौसी अपने वालिद-ए-माजिद का ज़िक्र करते हुए फ़रमाती हैं कि

“मेरे वालिद माजिद रहमतुल्लाहि अ’लैहि दुबले-पुतले और लंबे थे। लिबास में पाजामा-कुर्ता और टोपी पहना करते। मेहमान-नवाज़ी का बड़ा शौक़ था इसलिए अगर कोई दोस्त मज़ाक़ से भी ये कह देता कि भाई यूसुफ़ रहमानिया होटल सब्ज़ी बाग़ गए हुए कई दिन हो गए तो अब्बा जान मोहतरम उसे फौरन कहते जल्दी चलो जल्दी चलो मैं तुम्हें रहमानिया होटल ले जाता हूँ। अंग्रेज़ी और फ़ारसी में काफ़ी महारत हासिल थी। फ़ारसी और अंग्रेज़ी में घंटों बातें किया करते थे जिसमें उनके अंग्रेज़ी दोस्त होते जिनसे वो बिला झिझक अंग्रेज़ी में बातें किया करते थे। शे’र-ओ-शाइ’री से भी काफ़ी शग़्फ़ था।

हज़रत ख़्वाजा गेसू दराज़ चिश्ती अक़दार-ए-हयात के तर्जुमान-डॉक्टर सय्यद नक़ी हुसैन जा’फ़री

जवामिउ’ल-कलिम में मज़कूर है कि एक-बार मौलाना ज़ैनुद्दन दौलताबादी, ख़लीफ़ा मौलाना बुर्हानुद्दीन ग़रीब ने बंदगी-ए-ख़्वाजा से अ’र्ज़ किया कि इस ग़रीब के मरज़-ए-दिल की सेहत के लिए दुआ’ फ़रमाएं तो बंदगी-ए-ख़्वाजा ने अपने दाँतों से उंगली पकड़ ली और फ़रमाया कि मौलाना दिल को मरीज़ न कहिए।

हज़रत मौलाना शाह हिलाल अहमद क़ादरी मुजीबी

शाह हिलाल अहमद साहिब की ज़ात ने ख़ानक़ाही अंदाज़ ओ अतवार को शोहरत दी। ख़ानक़ाही माहौल के साथ मदरसा ओ इफ़्ता के वक़ार में कभी कमी महसूस नहीं होने दिया। हर छोटे बड़े सब से मिला करते थे और अपने उम्दा अख़्लाक़ की वज्ह से बहुत जल्द उनके क़रीब हो जाया करते। अपने इल्म ओ अमल, तक़्वा ओ परहेज़ गारी,आजिज़ी ओ इन्किसारी में अपने अस्लाफ़ के पैरो कार थे। उनकी रिवायतों के अमीन थे। उनकी निगाह अपने अस्लाफ़ को देखा करती थी। उन्होंने कई बुज़ुर्गों का दौर देखा था और उनकी सोहबत भी उठाई थी।

हकीम सय्यद शाह अलीमुद्दीन बल्ख़ी फ़िरदौसी

शाह अलीमुद्दीन बल्ख़ी साहिब ने 1946 ईस्वी का फ़साद भी देखा था। जब मुल्क में क़त्ल ओ ग़ारत का सिलसिला ज़ोरों पर था लोग देही इलाक़ों से शहरों की जानिब कूच कर रहे थे तो उनमें शाह साहिब भी अपने वालिद के साथ फ़तूहा से शहर ए अज़ीमाबाद आने वालों में शरीक थे। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मौलाना अब्दुल-क़ादिर अज़ाद सुबहानी, सर सय्यद अली इमाम बैरिस्टर वग़ैरा की सोहबत ओ संगत भी शाह साहिब को बहुत कुछ ज़िंदगी के अमली मैदान में सिखा गई।

चिश्तिया सिलसिला की ता’लीम और उसकी तर्वीज-ओ-इशाअ’त में हज़रत गेसू दराज़ का हिस्सा-प्रोफ़ेसर ख़लीक़ अहमद निज़ामी

अ’स्र-ए-हाज़िर का एक मशहूर दीदा-वर मुवर्रिख़ और माहिर-ए-इ’मरानियात ऑरनल्ड टाइन बी, अपनी किताब An Historians  Approach  To Religion (मज़हब मुवर्रिख़ की नज़र में) लिखता है कि तारीख़-ए-उमम ने मज़ाहिब-ए-आ’लम की इफ़ादियत और उनके असर-ओ-नुफ़ूज़ के जाएज़े के लिए एक मुवस्सिर अ’मली पैमाना बना लिया है, और वो है मुसीबत और मा’सियत में इन्सान की दस्त-गीरी की सलाहियत।… continue reading

ज़िक्र ए ख़ैर हज़रत शाह अहमद हुसैन चिश्ती शैख़पूरवी

छोटा शैख़पुरा चिश्तियों की क़दीम आमाज गाह है मगर यहाँ क़ादरी,सुहरवर्दी और अबुल उलाई बुज़ुर्ग भी आराम फ़रमा हैं। तज़्किरे और तारीख़ के हवाले से ये जगह हज़रत ताज महमूद हक़्क़ानी (तारीख़ ए विसाल 14 जमादी अल आख़िर)से इबारत है। नवीं सदी हिज्री में हज़रत ख़्वाजा सय्यद अब्दुल्लाह चिश्ती (पंजाब, पाकिस्तान) से रुश्द ओ हिदायत  के लिए छोटा… continue reading