दक्खिनी हिन्दी के सूरदास -सैयद मीरां हाशमी- डॉ. रहमतउल्लाह

ब्रजभाषा के महाकवि सूरदास के अतिरिक्त दक्खिनी हिन्दी में भी एक सूरदास हो चुका है जिसका नाम सैयद मीरां हाशमी बताया जाता है और जो दक्षिण भारत के आदिलशाही राज्यकाल का प्रसिद्ध कवि था। दक्खिनी हिन्दी का अधिकांश साहित्य इसी राज परिवार के संरक्षण में लिखा गया था। सन् 1685 ई. में मुगल सम्राट् औरंगजेब… continue reading

Qawwalon ke Qisse-9 Meraj Ahmad Nizami ka Qissa

हैदराबाद के सूफ़ी शैख़ एवं शाइर अब्दुल क़ादिर सिद्दीक़ी हसरत ने मौसीक़ी को एक विज्ञान की तरह सीखा न कि प्रदर्शन हेतु। अपने आध्यात्मिक मक़ाम कि वजह से वह माहिरीन-ए-फ़न के घरों या कूचा –ओ-बाज़ार के चक्कर नहीं लगा सकते थे इस कारण से उन्होंने संगीत सीखने का आधुनिक तरीक़ा इख़्तियार किया। बाज़ार में उपलब्ध… continue reading

Qawwalon ke Qisse-8 Khairabad ke Qawwalon ka Qissa

मदन ख़ान नामक से शख़्स अमरोहा के पास रहते थे।वह श्याम-वर्ण के थे और उनकी कद काठी भी अजीब थी। ख़ैराबाद आकर वह शैख़ सअदुद्दीन ख़ैराबादी की ख़ानक़ाह में रहने लगे । उनकी आवाज़ बड़ी अच्छी थी और हज़रत अक्सर उनका गाना सुनते थे।उन्ही दिनों क़न्नौज की एक खूबसूरत गायिका ख़ैराबाद आई हुई थी।मदन साहब… continue reading

Qawwalon ke Qisse-7 Habeeb Painter Qawwal ka Qissa

भारत-चीन युद्ध के समय जब पूरा देश एकता के सूत्र में बंध गया था,उस नाज़ुक दौर में अवाम को जगाने और सैनिकों का हौसला बढ़ाने का बीड़ा क़व्वाल हबीब पेंटर ने उठाया। उनकी क़व्वालियों से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने हबीब पेंटर को बुलबुल-ए-हिन्द की उपाधि से सम्मानित किया ।हबीब… continue reading

Qawwalon ke Qisse -6 Muhammad Yaqoob Khan aur Madar Bakhsh Khan ka Qissa

मुहम्मद याक़ूब ख़ां फुलवारीशरीफ ज़िला पटना में रहा करते थे उनके ताल्लुक़ात निहायत वसीअ थे। दूर दूर तक उनकी पहचान थी। सितार लाजवाब बजाते थे जिन लोगों को इनकी  महफ़िल याद है वो बड़े ख़ुशनुमा अंदाज़ में आपकी तारीफ़ किया करते हैं ।जब क़व्वाली गाना शुरू करते थे तो पहले सिर्फ सितार बजाते और ऐसा… continue reading

Qawwalon ke Qisse- 5 Muhammad Siddique Khan Qawwal ka Qissa

मुहम्मद सिद्दीक़ ख़ां अकबराबाद (आगरा) के क़रीब के रहने वाले थे वो सितार लाजवाब बजाते और बिला मिज़्राब बोल काटते और राग बजाते थे। इनका ख़ानदान गवैयों का है ये पहले इस्लाम पूर ज़िला नालंदा में मुलाज़िम थे फिर हज़रत शाह मुहम्मद अकबर अबू उलाई दानापूरी के मुरीद हो गए और बाज़ाबता क़व्वाली भी करने… continue reading