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हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार-ए-काकी के मजमूआ’-ए-मल्फ़ूज़ात फ़वाइदुस्सालिकीन का मुताला’ अज़ जनाब मौलाना अख़्लाक़ हुसैन देहलवी साहब

फ़वाइदुस्सालिकीन फ़ारसी नुस्ख़ा मतबूआ सन1310 हिज्री सन1891 ई’सवी मतबूआ’ मुज्तबाई, दिल्ली ,इंडिया, हजम 36  सफ़हात,  साइज़ 20 X 26 ये किताब क़ुतुबल-अक़्ताब हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार ओशी  अल-मुतवफ़्फ़ा सन 633 हिज्री के गिराँ-क़दर मल्फ़ूज़ात  का मजमूआ’ है जिसे हज़रत बाबा फ़रीद मसऊ’द गंज शकर मुतवफ़्फ़ा सन 670 हिज्री ने मुदव्वन फ़रमाया था, ये मजमूआ’–ए-मल्फ़ूज़ात  सात मजालिस पर मुश्तमिल है हर मज्लिस के… continue reading

हज़रत सय्यद अशरफ़ जहाँगीर सिमनानी रहमतुल्लाह अ’लैह

लताएफ़-ए-अशरफ़ी में हैं कि हज़रत सय्यद अशरफ़ के आने से पहले हज़रत अ’लाउद्दीन ने अपने मुरीदों को बशारत दी थी कि

आँ कसे कि अज़ दो साल इंतिज़ार-ए-ऊ मी-कशीदः-ऐम-ओ-तरीक़-ए-मुवासलत-ए-ऊ मी-दीद:-ऐम इमरोज़ फ़र्दा मी-रसद (जिल्द 2 सफ़हा 95)

और जब हज़रत सय्यद अशरफ़ पंडोह के क़रीब पहुँचे तो हज़रत अ’लाउद्दीन क़ैलूला फ़रमा रहे थे लेकिन यकायक बोले

“बू-ए-यार मी आयद” ।

Women’s voices in Bhakti Literature

For the women, Bhakti became an outlet. A study of the writings of these women Bhaktas shows that they negotiated patriarchy through Bhakti which provided a space for them. Most of these women were encultured into a certain culture which was mostly a closed, patriarchal culture, but through this movement, a certain space was created for their freedom and mobility.

Krishna as a symbol in Sufism

सूफ़ियों की समा में श्याम रंग भारत में इस्लाम केवल मुसल्लह ग़ाज़ियों के ज़रिये ही नहीं बल्कि तस्बीह–ब–दस्त सूफ़ियों के करामात से भी दाख़िल हुआ था। सूफ़ी ‘हमा अज़ ऊस्त’(सारा अस्तित्व उसी परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है), तथा ‘हमा ऊस्त’(सम्पूर्ण अस्तित्व तथा परमेश्वर में कोई अन्तर नहीं है), की मान्यता के क़ायल रहे हैं। उन्हें… continue reading

सूफ़ी ‘तुराब’ के कान्ह कुँवर (अमृतरस की समीक्षा)

हिन्दुस्तान ने सभ्यता के प्रभात काल से ही विभिन्न पन्थों, मतों, परम्पराओं और वैचारिक पद्धतियों का हृदय से स्वागत किया है । जो भी वस्तु या विचार शुभ है, भद्र है भारत ने उसे हमेशा से आमन्त्रित किया है । ऋग्वेद का ऋषि इसी कामना को “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः[1]” (सभी ओर से… continue reading

हज़रत ख़्वाजा ग़ुलाम हुसैन अहमद अल-मा’रूफ़ मिर्ज़ा सरदार बेग साहिब क़िब्ला बल्ख़ी सुम्मा हैदराबादी

हज़रत साहिब क़िब्ला का हमेशा तआ’म दो-चार चपातियाँ और एक प्याला भर शोरबा था। जब आपके खाने का वक़्त आता तो आप शोरबा नोश फ़रमाते।रोटियाँ मिर्ज़ा को दे दो फ़रमाते कि वो दकनी है और दकनियों को गोश्त मर्ग़ूब है। दो-चार दिन तक बोटियाँ खा लिए। बा’द अ’र्ज़ किए कि या हज़रत मैं यहाँ बोटियाँ खाने को हाज़िर नहीं हुआ या’नी ख़ुदा-तलबी के लिए हाज़िर हुआ हूँ।हुक्म हुआ कि मिर्ज़ा बे-मरे ख़ुदा नहीं मिलता।