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सुल्तान सख़ी सरवर लखदाता-मोहम्मदुद्दीन फ़ौक़

आबा-ओ-अज्दाद पौने सात सौ साल का ज़िक्र है कि एक बुज़ुर्ग ज़ैनुल-आ’बिदीन नाम रौज़ा-ए-रसूल-ए-पाक के मुजाविरों में थे।इसी हाल में वहाँ उनको बरसों गुज़र गए।रसूल-ए-करीम की मोहब्बत से सरशार और रौज़ा-ए-अक़्दस की ख़िदमात में मस्त थे कि ख़ुद आँ-हज़रत सलल्ल्लाहु अ’लैहि व-सलल्लम ने एक रात ख़्वाब में फ़रमाया कि उठ और हिन्दुस्तान की सैर कर।आप… continue reading

सूफ़ी ‘तुराब’ के कान्ह कुँवर (अमृतरस की समीक्षा)

हिन्दुस्तान ने सभ्यता के प्रभात काल से ही विभिन्न पन्थों, मतों, परम्पराओं और वैचारिक पद्धतियों का हृदय से स्वागत किया है । जो भी वस्तु या विचार शुभ है, भद्र है भारत ने उसे हमेशा से आमन्त्रित किया है । ऋग्वेद का ऋषि इसी कामना को “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः[1]” (सभी ओर से… continue reading

हज़रत ख़्वाजा ग़ुलाम हुसैन अहमद अल-मा’रूफ़ मिर्ज़ा सरदार बेग साहिब क़िब्ला बल्ख़ी सुम्मा हैदराबादी

हज़रत साहिब क़िब्ला का हमेशा तआ’म दो-चार चपातियाँ और एक प्याला भर शोरबा था। जब आपके खाने का वक़्त आता तो आप शोरबा नोश फ़रमाते।रोटियाँ मिर्ज़ा को दे दो फ़रमाते कि वो दकनी है और दकनियों को गोश्त मर्ग़ूब है। दो-चार दिन तक बोटियाँ खा लिए। बा’द अ’र्ज़ किए कि या हज़रत मैं यहाँ बोटियाँ खाने को हाज़िर नहीं हुआ या’नी ख़ुदा-तलबी के लिए हाज़िर हुआ हूँ।हुक्म हुआ कि मिर्ज़ा बे-मरे ख़ुदा नहीं मिलता।

हज़रत शैख़ अबुल हसन अ’ली हुज्वेरी रहमतुल्लाह अ’लैहि

आख़िरी ज़िंदगी तक लाहौर ही में क़ियाम-पज़ीर रहे, और यहीं अबदी नींद सो रहे हैं।साल-ए-वफ़ात सन 465 हिज्री है। इंतिक़ाल के बा’द मज़ार ज़ियारत-गाह बन गया। हज़रत ख़्वजा मुई’नुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अ’लैह ने उनकी क़ब्र पर चिल्ला किया, और जब मुद्दत ख़त्म कर के रुख़्सत होने लगे तो ये शे’र पढ़ा:-
गंज-बख़्श-ए-हर दो-आ’लम मज़हर-ए-नूर-ए-ख़ुदा
कामिलाँ रा हुनर-ए-कामिल नाक़िसाँ रा राहनुमा
तज़्किरा-निगारों का बयान है कि गंज-बख़्श के नाम से शोहरत का सबब यही है.

हज़रत शाह बर्कतुल्लाह ‘पेमी’ और उनका पेम प्रकाश

‘पेमी’ हिन्दू तुरक में, हर रंग रहो समाय
देवल और मसीत में, दीप एक ही भाय.

Women in Rishi Movement of Kashmir- Rashid Nazki

Sheikh Noor-U-Deen Noorani, popularly known as Nund Rishi also adopted the poetic form of expressing his great spiritual ideas and discourses. This tradition was continued by notable saintesses Sham Bibi, Dahat Ded, and Behat Ded. Lal Ded, however, was the most renowned of ours saintesses, excelling everyone else in thought, content, and style. Kashmiris rightly call her their spiritual mother. It was because of her influence that Sheikh Noor-U-Deen Noorani, towards the end of his life, took some women saintesses in his circle of disciples.