सुल्तानुल-मशाइख़ और उनकी ता’लीमात-हज़रत मोहम्मद आयतुल्लाह जा’फ़री फुलवारवी

सुल्तानुल-मशाइख़ की शख़्सियत पर अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है इसलिए उनकी शख़्सियत के किसी नए गोशे का इन्किशाफ़ मुश्किल है।सीरत-ओ-शख़्सियत के किसी नए पहलु तक मुहक़्क़िक़ीन और अहल-ए-क़लम ही की रसाई हो सकती है।ख़ाकसार इसका अहल नहीं।ये चंद सतरें सुल्तानुल-मशाइख़ महबूब-ए-इलाही हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, क़ुद्दिसा सिर्रहु से अ’क़ीदत-ओ-मोहब्बत के नतीजे में और सिलसिला-ए-चिश्तिया… continue reading

This Path is not about religion: Just faith

The lyrical notes enveloped his senses. He was mesmerized. A band of wandering minstrels was exhorting Moinuddin Chishti. And just then Moghul emperor Akbar was enveloped by a yearning; he had to go to Ajmer. It was sometime during the 1560s. The emperor travelled to the shrine to pray and distribute money among the poor… continue reading

Khwaja Muinuddin’s Seven Illuminating Letters To his Spiritual Successor

A veritable mine of “Game of Wisdom” In this Blog, we reproduce seven of the most illuminating and thought-provoking letters on the cult of Sufism which Hazrat Khwaja Muinuddin Chishti affectionately wrote from Ajmer to his Khalifa (spiritual successor) Khawaja Qutubuddin Bakhtiyar kaki (may peace of God be upon his soul) who was the accredited… continue reading

Dara Shukoh and Baba Laal Bairaagi.(दारा शुकोह और बाबा लाल बैरागी की वार्ता )

रोज़ ए अजल से इस जहान ए फ़ानी के अर्श पर गर्दिश करती आत्मा की यह पतंग उस दिन फिर वक़्त की आँधी मे टूट कर ज़मीन पर आ गिरी। इस पतंग ने उन खुदा के बंदों को देखा है जिन्होने इसे इश्क़ की डोर से बांध कर कन्नी दी और पतंग को दोबारा अर्श… continue reading

Ishqbaazi (इश्क़बाज़ी)

रोज़ ए अज़ल से यह कहानी चलती आ रही है । खुदा ने जब ये क़ाएनात बनाई तो साथ ही साथ आत्मा की पतंग भी इश्क़ की डोर से बांध कर उड़ा दी । पतंग जब आसमान में पहुंची तो उसे ऐसा लगने लगा कि ये डोर उसे बांध रही है । उसकी अंतरात्मा ने… continue reading

Bhakti Movement and Sulh e Kul ( भक्ति आंदोलन और सुल्ह ए कुल )

भक्ति आंदोलन हिंदुस्तानी संस्कृति के सामान ही विविधताओं का पिटारा है। हिन्दू और मुसलमान भक्त कवियों ने जहाँ जात पात और मज़हब से परे मानवता और प्रेम को अपनाया वहीं सूफ़ियों से उनका प्रेम तत्व भी ग्राह्य किया। भक्ति आंदोलन की शुरुआत तो आठवी शताब्दी में ही अलवार संतों द्वारा हो गयी थी परन्तु कबीर… continue reading