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सुल्तान सख़ी सरवर लखदाता-मोहम्मदुद्दीन फ़ौक़

आबा-ओ-अज्दाद पौने सात सौ साल का ज़िक्र है कि एक बुज़ुर्ग ज़ैनुल-आ’बिदीन नाम रौज़ा-ए-रसूल-ए-पाक के मुजाविरों में थे।इसी हाल में वहाँ उनको बरसों गुज़र गए।रसूल-ए-करीम की मोहब्बत से सरशार और रौज़ा-ए-अक़्दस की ख़िदमात में मस्त थे कि ख़ुद आँ-हज़रत सलल्ल्लाहु अ’लैहि व-सलल्लम ने एक रात ख़्वाब में फ़रमाया कि उठ और हिन्दुस्तान की सैर कर।आप… continue reading

Guru Nanak’s Music of Eternal Harmony

Among all the founders of religious faiths and spiritual systems, Guru Nanak stands apart and unique with the stunning simplicity and directness of his speech, the Guru Bani, that touches both the hearts and minds at one go and both enlightens and soothes the human souls wallowing in the darkness of despair and desolation of… continue reading

Fawaid ul fuwaad (Morals For The Heart) – Book review

तसव्वुफ़ में साहित्य के विशाल भंडार को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है । मक्तूबात (पत्र ), तज़किरा (जीवनवृत) एवं मल्फ़ूज़ात (उपदेश)। मक्तूबात के अंतर्गत उन पत्रों का संकलन आता है जो सूफी संतों ने अपने  मुरीदों और समकालीन संतों को लिखे हैं  । तज़किरे के अंतर्गत जीवनवृत संग्रह आता है जो… continue reading

If rain can grow sugarcane, man can realize the Divine – the story of Shaikh Muhibullah

O’ Beauty of Truth, the Eternal Light! Do I call you necessity and possibility, Do I call you the ancient divinity, The One, creation and the world, Do I call you free and pure Being, Or the apparent lord of all, Do I call you the souls, the egos and the intellects, The imbued manifest… continue reading

Sufiyon ka Bhakti Raag ( सूफ़ियों का भक्ति राग )

तसव्वुफ मुसलमानों के नज़दीक मज़हब के आंतरिक पक्ष का नाम है। इससे तात्पर्य वह तपस्या और संयम है जो दिल के पर्दे हटाये और सत्य का रहस्योद्घाटन करे। तसव्वुफ के उद्भव एवं विकास के दो युग बताये जाते है। पहला युग इस्लाम के आरम्भ से नवीं सदी ईस्वी के शुरु तक और दूसरा नवी सदी… continue reading

This Path is not about religion: Just faith

The lyrical notes enveloped his senses. He was mesmerized. A band of wandering minstrels was exhorting Moinuddin Chishti. And just then Moghul emperor Akbar was enveloped by a yearning; he had to go to Ajmer. It was sometime during the 1560s. The emperor travelled to the shrine to pray and distribute money among the poor… continue reading