Articles By Sufinama Archive

Sufinama Archive is an initiative to reproduce old and rare published articles from different magazines specially on Bhakti movement and Sufism.

Mystics of the sayyid Lodi period (1414 AD. To 1526 AD. )- A.Halim

An essay on holy men and mystics can hardly be separated from one on cultural history, because mystics and holy men were most often scholars and torch-bearers of learning and at the same time scholars were invariably mystics of some sort. It has been observed that much of our knowledge of the cultural movements is… continue reading

अभागा दारा शुकोह- श्री अविनाश कुमार श्रीवास्तव

सोमवार 20 मार्च सन् 1615 की रात्रि में, मेवाड़ की सफलता के एक मास पश्चात्, भारतवर्ष की ऐतिहासिक नगरी अजमेर में राजकुमार खुर्रम की प्रियतमा मुमताज महल ने शाहजहाँ के सब से प्रिय, सबसे विद्वान् पर सबसे अभागे द्वारा शुकोह को जन्म दिया। बाबा का दिया हुआ ‘मुहम्मद दारा शुकोह’ का नाम, पिता का दिया… continue reading

गुजरात के सूफ़ी कवियों की हिन्दी-कविता-अम्बाशंकर नागर

गुजरात ने हिन्दी भाषा और साहित्य की अभिवृद्धि में प्रशंसनीय योग दिया है, यहां के वैष्णव कवियों ने ब्रजभाषा में, साधु-संतों ने सधुक्कड़ी हिन्दी में, राजाश्रित चारणों ने डिंगल में और सूफ़ी संतों ने हिन्दवी या गूजरी-हिन्दी में सुन्दर साहित्य का सृजन किया है। गुजरात के सूफ़ी कवियों और उनकी कृतियों के अध्ययन की ओर… continue reading

Characteristics of the Chishtia Silsila-Maikash Akbarabadi

SUFIS have never been negligent towards their duty as preachers of high morals and spirituality. They have always considered themselves responsible for the reform of the whole of mankind, irrespective of caste and creed, race and religion, and have considered every community of the worlds as deserving of their love and compassion. In the very… continue reading

अल-ग़ज़ाली की ‘कीमिया ए सआदत’ की पाँचवी क़िस्त

चतुर्थ उल्लास (परलोक की पहचान) पहली किरण -परलोक का सामान्य परिचय      मनुष्य जब तक मृत्यु को नहीं पहचानेगा, तब तक परलोक को नहीं पहचान सकता है, और जब तक जीवन को न जानेगा, तब तक मृत्यु को नहीं जान सकता। जीवन को पहचान तो जीव के यथार्थ स्वरूप को जानना ही है, और यह… continue reading

अल-ग़ज़ाली की ‘कीमिया ए सआदत’ की चौथी क़िस्त

तृतीय उल्लास (माया की पहचान) पहली किरण-संसार का स्वरूप, जीव के कार्य और उसका मुख्य प्रयोजन याद रखो, यह संसार भी धर्ममार्ग का एक पड़ाव ही है। जो जिज्ञासु भगवान् की ओर चलते हैं, उनके लिये यह मार्ग में आया हुआ ऐसा स्थान है, जैसे किसी विशाल वन के किनारे कोई नगर या बाजार हो।… continue reading

अल-ग़ज़ाली की ‘कीमिया ए सआदत’ की तीसरी क़िस्त

द्वितीय उल्लास (भगवान् की पहचान) पहली किरण शरीर और संसार की वस्तुओं पर विचार करने से भगवान् की पहचान      सन्तों का यह वचन प्रसिद्ध है और उन्होंने यही उपदेश दिया है कि जब तुम अपने-आपको पहचानोगे तभी निःसन्देह भगवान् को भी पहचान सकोगे। प्रभु भी कहते हैं कि जिसने अपने आत्मा और मन को… continue reading

अल-ग़ज़ाली की ‘कीमिया ए सआदत’ की दूसरी क़िस्त

प्रथम उल्लास –(अपने-आप की पहचान) पहली किरण भगवत्साक्षात्कार के लिए अपने को पहचानने की आवश्यकता याद रखो, अपने-आपको पहचानना ही श्रीभगवान् को पहचानने की कुंजी है। इसी विषय में महापुरुष ने भी कहा है कि जिसने अपने को पहचाना है उसने निःसन्देह अपने प्रभु को भी पहचान लिया है। तथा प्रभु भी कहते हैं कि… continue reading

When Acharya Ramchandra Shukla met Surdas ji (भक्त सूरदास जी से आचार्य शुक्ल की भेंट)

यह नक्षत्रों से भरा आकाश वियोगी जनों के लिए एक बहुत बड़ा सहारा है। उस दिन भी तो आकाश नक्षरों से भरा हुआ था और मैं उस सुनील नभ के प्रत्येक तारे में अपनी प्रिया के रूप-वैभव की गरिमा देखने में तल्लीन होकर, महादेवी जी की यह पंक्ति- सो रहा है विश्व पर प्रिय तारकों… continue reading

Mystic Lipstick and Meera(मिस्टिक लिपिस्टिक और मीरा)

डर्हम के बिशप को भी विक्टोरिया के समय में कहना पड़ा था कि “मिस्टिक लोगों में ‘मिस्ट’ नहीं है। वह बहुत साफ़ साफ़ देखते हैं और कहते हैं।” पश्चिम में इसका सब से बड़ा प्रमाण विलियम लौ की ‘सीरियस कौल’ नामी पुस्तक है जिसने अठारवीं सदी में भी इंग्लिस्तान में धर्म की धारा बहाई और… continue reading