Articles By Sufinama Archive

Sufinama Archive is an initiative to reproduce old and rare published articles from different magazines specially on Bhakti movement and Sufism.

बाबा फ़रीद शकर गंज का कलाम-ए- मा’रिफ़त-प्रोफ़ेसर गुरबचन सिंह तालिब

ऐ फ़रीद गलियों में कीचड़ है। महबूब का घर दूर है। मगर उसकी मोहब्बत कशिश कर रही है। मैं जाऊँ तो कंबली भीगती है भीगने दो। मेंह बरसता है तो अल्लाह की मर्ज़ी से जो बरसे बरसने दो।मैं महबूब से मिलूं मेरा प्यार न टूटे

हज़रत बाबा साहिब की दरगाह-मौलाना वहीद अहमद मसऊ’द फ़रीदी

जब बहिश्ती दरवाज़ा संग-ए-मरमर का बनाया गया तो वहाँ से ये किवाड़ और चौखट ला कर यहाँ लगा दिए गए। यही वो जगह है जहाँ हज़रत-ए-वाला सबसे पहले अजोधन आकर तशरीफ़ फ़रमाए थे तो इसी जगह “अपनी गुदड़ी सिया करते थे। लिहाज़ा इसी जगह चार दिवारी का नाम “गुदड़ी” हो गया।

हज़रत बाबा फ़रीद गंज शकर के तबर्रुकात-मौलाना मुफ़्ती नसीम अहमद फ़रीदी

शैख़ मुनव्वर के एक साहिब-ज़ादे शैख़ मोहम्मद ई’सा चानलदा थे।ये भी अपने ज़माने के शैख़-ए-तरीक़त और अपने आबा के जाँ-नशीन-ओ-सज्जादा नशीन थे।आपका सिलसिला-ए-बैअ’त अपने बाप दादा से था और आपके पास वो क़दीम तबर्रुकात भी महफ़ूज़ थे जिन्हें सबसे पहले शैख़ सालार अपने साथ अमरोहा लाए थे।इन तबर्रुकात को हज़रत बाबा फ़रीद और उनके पीर-ओ-मुरीद हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी (रहि.) देहलवी से निस्बत का शरफ़ हासिल है।ये तबर्रुकात पहले एक पुरानी वज़अ’ के लकड़ी के पिटारे में रखे हुए थे। जिसे देखकर ख़ुद अंदाज़ा होता था कि ये पिटारा पाँच छः सौ साल पुराना होगा।फिर ज़्यादा बोसीदा हो जाने की वजह से इन तबर्रुकात को तह ब-तह कर के कपड़े में इस तरह सिल्वा दिया गया है कि इनका सिर्फ़ थोड़ा सा हिस्सा देखा जा सकता है और बाक़ी हिस्सा तीन तरफ़ से कपड़े में लपेट दिया गया है।मोहल्ला झंडा शहीद पर एक मकान जिसकी कोठरी में ये तबर्रुकात तक़रीबन पाँच सौ साल तक रखे रहे हैं अब वो सब मकान मुंहदिम हो चुके हैं और उनकी जगह नई नई ता’मीरें हो गई हैं।मगर उस पुरानी कोठरी का खंडर अभी तक बाक़ी है लेकिन इसकी ये नुमूद भी चंद रोज़ की मेहमान है।

बाबा फ़रीद शकर गंज

(पाल माल गज़ट लंदन से तर्जुमा ) पाक पट्टन शरीफ़ दुनिया-ए-तवारीख़ को अजोधन के नाम से तेईस सौ साल से मा’लूम है लेकिन उसका दूसरा नाम पाक पट्टन शरीफ़ आज से आठ सौ साल क़ब्ल उसे मिला था। उस वक़्त से ये अपने क़िला’ की मज़बूती के लिए नहीं बल्कि एक मुक़द्दस हस्ती की जा-ए-आराम… continue reading

तरीक़ा-ए-सुहरवर्दी की तहक़ीक़-मीर अंसर अ’ली

ज़ैल में दो आ’लिमाना ख़त तहरीर किए जाते हैं जो जनाब मौलाना मीर अनसर अ’ली चिश्ती निज़ामी अफ़सर-ए-आ’ला महकमा-ए-आबकारी,रियासत-ए-हैदराबाद दकन ने अ’र्सा हुआ इर्साल फ़रमाए थे। मीर मौसूफ़ नए ज़माना के तअस्सुरात के सबब फ़ुक़रा और हज़रात-ए-सूफ़िया-ए-किराम से बिल्कुल बद-अ’क़ीदाथे,मगर आपकी वालिदा मोहतरमा ने ब-वक़्त-ए- रिहलत ऐसी नेक दुआ’ दी कि फ़ौरन हज़रत मख़दूम सय्यिद… continue reading

बर्र-ए-सग़ीर में अ’वारिफ़ुल-मआ’रिफ़ के रिवाज पर चंद शवाहिद-(आठवीं सदी हिज्री तक)-डॉक्टर आ’रिफ़ नौशाही

शैख़ गंज शकर 569-664 हिज्री) अ’वारिफ़ का दर्स देते थे। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने अ’वारिफ़ के पाँच अबवाब उन्हीं से पढ़े थे। गंज शकर का पढ़ाने का अंदाज़ बहुत दिल-नशीन था और कोई दूसरा उन जैसा अ’वारिफ़ नहीं पढ़ा सकता था। बारहा ऐसा हुआ कि सुनने वाला उनके ज़ौक़-ए-बयान में ऐसा मह्व हुआ कि ये तमन्ना करते पाया गया कि काश उसी लम्हे मौत आ जाए तो बेहतर है। एक दिन ये किताब शैख़ की ख़िदमत में लाई गई तो इत्तिफ़ाक़ से उसी दिन उनके हाँ लड़का पैदा हुआ। शैख़ुश्शुयूख़ के लक़ब की मुनासबत से उस का लक़ब “शहाबुद्दीन” रखा गया।

तल्क़ीन-ए-मुरीदीन-हज़रत शैख़ शहाबुद्दीन सुहरवर्दी

इंतिख़ाब-ओ-तर्जुमा:हज़रत मौलाना नसीम अहमद फ़रीदी अल्लाह तआ’ला फ़रमाता है ‘वला ततरुदिल-लज़ी-न यद्ऊ’-न रब्बहुम बिल-ग़दाति-वल-अ’शीयी युरीदून वज्ह-हु।’ (आप न हटाएं अपने पास से उन लोगों को जो अपने रब को सुब्ह-ओ-शाम पुकारते हैं और उनका हाल ये है कि बस अपने रब की रज़ा चाहते हैं)। लफ़्ज़-ए-इरादत जो ख़ास इस्तिलाह के तौर पर मशाइख़-ए-सूफ़िया के यहाँ… continue reading

हज़रत शैख़ बुर्हानुद्दीन ग़रीब

लोगों की ऐ’ब-जोई के सिलसिले में मुरीदों को बताया कि अगर तुम्हारा कोई ऐ’ब ज़ाहिर करे तो ये देखो कि तुम में वो ऐ’ब है या नहीं।अगर है तो उस से बाज़ आओ, और ऐ’ब ज़ाहिर करने वाले से कहो तुम ने मुझ पर करम किया कि मेरा ऐ’ब मुझको बता दिया, और अगर तुम में ये ऐ’ब नहीं है तो दुआ’ करो कि इलाही उस ऐ’ब ज़ाहिर करने वाले को ऐ’ब-जोई से बजाए, और मुझको भी बद-कलामी से महफ़ूज़ रखे।

हज़रत शरफ़ुद्दीन अहमद मनेरी रहमतुल्लाह अ’लैह

ज़िक्र से मुराद ख़ुदा-वंद तआ’ला की याद है। इसकी चार क़िस्में हैं: 1 ज़बान पर हो लेकिन दिल में न हो, 2 ज़बान और दिल दोनों में हो, मगर दिल किसी वक़्त उससे ग़ाफ़िल हो जाता हो, लेकिन ज़बान पर जारी हो, 3 ज़बान और दिल में बराबर हो, 4 दिल में हो और ज़बान ख़ामोश हो।

TASAWWUF AND MODERN RESEARCH – KHAJA KHAN.

Tafriqa dar Ruhi haywani buad
Nafs Wahid Ruhi Insani buad
(Differentiations are in animal souls
The human soul is one individual.)