Articles By Sufinama Archive

Sufinama Archive is an initiative to reproduce old and rare published articles from different magazines specially on Bhakti movement and Sufism.

Characteristics of the Chishtia Silsila-Maikash Akbarabadi

SUFIS have never been negligent towards their duty as preachers of high morals and spirituality. They have always considered themselves responsible for the reform of the whole of mankind, irrespective of caste and creed, race and religion, and have considered every community of the worlds as deserving of their love and compassion. In the very… continue reading

अल-ग़ज़ाली की ‘कीमिया ए सआदत’ की पाँचवी क़िस्त

चतुर्थ उल्लास (परलोक की पहचान) पहली किरण -परलोक का सामान्य परिचय      मनुष्य जब तक मृत्यु को नहीं पहचानेगा, तब तक परलोक को नहीं पहचान सकता है, और जब तक जीवन को न जानेगा, तब तक मृत्यु को नहीं जान सकता। जीवन को पहचान तो जीव के यथार्थ स्वरूप को जानना ही है, और यह… continue reading

अल-ग़ज़ाली की ‘कीमिया ए सआदत’ की चौथी क़िस्त

तृतीय उल्लास (माया की पहचान) पहली किरण-संसार का स्वरूप, जीव के कार्य और उसका मुख्य प्रयोजन याद रखो, यह संसार भी धर्ममार्ग का एक पड़ाव ही है। जो जिज्ञासु भगवान् की ओर चलते हैं, उनके लिये यह मार्ग में आया हुआ ऐसा स्थान है, जैसे किसी विशाल वन के किनारे कोई नगर या बाजार हो।… continue reading

अल-ग़ज़ाली की ‘कीमिया ए सआदत’ की तीसरी क़िस्त

द्वितीय उल्लास (भगवान् की पहचान) पहली किरण शरीर और संसार की वस्तुओं पर विचार करने से भगवान् की पहचान      सन्तों का यह वचन प्रसिद्ध है और उन्होंने यही उपदेश दिया है कि जब तुम अपने-आपको पहचानोगे तभी निःसन्देह भगवान् को भी पहचान सकोगे। प्रभु भी कहते हैं कि जिसने अपने आत्मा और मन को… continue reading

अल-ग़ज़ाली की ‘कीमिया ए सआदत’ की दूसरी क़िस्त

प्रथम उल्लास –(अपने-आप की पहचान) पहली किरण भगवत्साक्षात्कार के लिए अपने को पहचानने की आवश्यकता याद रखो, अपने-आपको पहचानना ही श्रीभगवान् को पहचानने की कुंजी है। इसी विषय में महापुरुष ने भी कहा है कि जिसने अपने को पहचाना है उसने निःसन्देह अपने प्रभु को भी पहचान लिया है। तथा प्रभु भी कहते हैं कि… continue reading

When Acharya Ramchandra Shukla met Surdas ji (भक्त सूरदास जी से आचार्य शुक्ल की भेंट)

यह नक्षत्रों से भरा आकाश वियोगी जनों के लिए एक बहुत बड़ा सहारा है। उस दिन भी तो आकाश नक्षरों से भरा हुआ था और मैं उस सुनील नभ के प्रत्येक तारे में अपनी प्रिया के रूप-वैभव की गरिमा देखने में तल्लीन होकर, महादेवी जी की यह पंक्ति- सो रहा है विश्व पर प्रिय तारकों… continue reading

अल-ग़ज़ाली की ‘कीमिया ए सआदत’ की पहली क़िस्त

पारसमणि का मूल आधार है ‘कीमिया ए सआदत’ इसके लेखक मियां मुहम्मद ग़ज़ाली साहब ईरान के एक सुप्रसिद्ध सन्त थे। उनका पूरा नाम था हुज्जतुल इस्लाम अबू हमीद मुहम्मद इब्न-मुहम्मद-अल-तूसी, किन्तु सामान्यतया वे इमाम ग़ज़ाली के नाम से सुप्रसिद्ध है। इनका जन्म सन् 1054 ई. (450 हिज्री) में खुरासान प्रान्त के अन्तर्गत तूस नामक गाँव… continue reading

महाराष्ट्र के चार प्रसिद्ध संत-संप्रदाय- श्रीयुत बलदेव उपाध्याय, एम. ए. साहित्याचार्य

भारतवर्ष में संत-महात्माओं की संख्या जिस प्रकार अत्यंत अधिक रही है, उसी प्रकार उन के द्वारा स्थापित सम्प्रदायों की भी संख्या बहुत ही अधिक है। समग्र भारत के संप्रदायों के संक्षिप्त वर्णन के लिए कितने ही बड़े बड़े ग्रंथों की जरूरत पड़ेगी। वह भी किसी एक विद्वान् के मान की बात नहीं। इस लेख में… continue reading

हाफ़िज़ की कविता – शालिग्राम श्रीवास्तव

हिन्दी जाननेवालों को फ़ारसी-किवता के रसास्वादन के लिए पहले दो-एक मोटी मोटी बातों की हृदयस्थ कर लेना चाहिए। फ़ारस या ईरान में मुसलमानों के आगमन से पहले आमोद-प्रमोद को सामग्री में शराब का विशेष स्थान था। जगह जगह बड़े-बड़े शराबखाने खुले हुए थे, जिनको मैक़दा वा ख़राबात, उनके अध्यक्ष को पीरेमुग़ाँ, और उनमें काम करनेवाले… continue reading

खुसरो की हिंदी कविता – बाबू ब्रजरत्नदास, काशी

तेहरवीं शताब्दी के आरंभ में, जब दिल्ली का राजसिंहासन गुलाम वंश के सुल्तानों के अधीन हो रहा था, अमीर सैफुद्दीन नामक एक सरदार  बल्ख़ हज़ारा से मुग़लों के अत्याचार के कारण भागकर भारत आया और एटा के पटियाली नामक ग्राम में रहने लगा। सौभाग्य से सुल्तान शम्सुद्दीन अल्तमश के दरबार में उसकी पहुँच जल्दी हो… continue reading